Monday, April 18, 2016

History of Kshatriya samrat Naagbhatt Pratihar

===== सम्राट_नागभट्ट_प्रतिहार =====


लक्ष्मणवंशी प्रतिहार क्षत्रिय वंश का वस्तुतः राजनैतिक इतिहास प्रमुख रुप से इसके संस्थापक नागभट्ट प्रथम से प्रारम्भ होता है। नागभट्ट प्रथम के परदादा महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का समय डॉ बैजनाथ के अनुसार छठी शताब्दी के आसपास था। डॉ के सी श्रीवास्तव के अनुसार इस वंश की प्राचीनता पांचवीं सदी तक जाती है। पुलिकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख के 22 वें श्लोक में गुर्जरात्रा प्रदेष (वर्तमान का गुजरात) भड़ौच का उल्लेख सर्वप्रथम हुआ।
महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का पुत्र रज्जिल, रज्जिल का पुत्र नरभट एवं नरभट का पुत्र नागभट्ट था। इस आधार पर इतिहासकार नागभट्ट का काल 730 ई. से प्रारम्भ मानते है। 730 ई. वह कालखण्ड था। जब नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल पर अधिकार कर वास्तविक रुप से प्रतिहार साम्राज्य का श्री गणेश किया था। उस समय नागभट्ट पूर्णयुवावस्था में था।
नागभट्ट के पिता नरभट मण्डौर के शासक थे। लगभग 725 ईस्वीं के आसपास अरब के मुस्लिमों ने सिंध व मुल्तान पर अधिकार करने के पश्चात मण्डौर राज्य पर आक्रमण किया था। परंतु राजकुमार नागभट्ट ने आंगे बढकर अरबों प्रत्याक्रमण कर उन्हें बुरी तरह पराजित किया तथा पलायन करने पर बाध्य किया। अरब सेनाएँ मण्डौर को छोडकर भीनमाल की ओर बढ गई। उस समय उनका अरब सेनापति जुनैद था।
अरब सेनापति जुनैद मण्डौर के प्रतिहार क्षत्रियों से हार पिटकर पराजित होने के बाद भीनमाल की ओर बढा। उस समय भीनमाल मे चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। यहां का शासक कमजोर था। अतः अरबो ने इसे जीत लिया तथा वे उज्जैन की ओर आंगे बढे। बिलादुरी ने अपने ग्रन्थ में लिखा है--- अरब सेनापति जुनैद खां ने उज्जैन, बहरीमद, अलमालिवह (मालवा), मारवाड़, वलमण्डल, दहनाज और बरवास (भड़ौच) पर आक्रमण किये। उसने भीनमाल पर पर अधिकार किया।
इससे सपष्ट है कि इन आक्रमणों में उसे केवल भीनमाल पर ही सफलता मिली। उज्जैन उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन के शासनाअंतर्गत था। गौडवहों के अनुसार अरबों के आक्रमण की जानकारी मिलते ही यशोवर्मन महेन्द्र पर्वतीय राजाओं की विजय यात्रा को बीच में छोडकर सीघा मध्य देश को पार करते हुए उज्जैन आकर अरबी सेनाओं पर प्रत्याक्रमण किया।
आक्रमण इतना जबरदस्त था कि अरबों के पांव उखड गये। उसने उनका पीछा करते हुए अनेक युद्धों में पराजित करते हुए सिंध के पार खदेड़ दिया। अब केवल मकरान ही अरबों के पास रह गया। वहाँ से यशोवर्मन मण्डौर गया। वहां उसका स्वागत हुआ। ऐसा लगता है कि नागभट्ट प्रथम को उसने भीनमाल मजबूत करने के लिए कहा।
उस काल में भीनमाल का बहुत ही महत्व था क्योंकि सिंध में भीनमाल होकर ही मालवा व कन्नौज मध्यदेश में जाया जा सकता था। चीनी यात्री हुऐनसांग 641 ईस्वीं में भीनमाल गया था। उस समय वहाँ चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। शिशुपाल वध के लेखक महाकवि माघ एवं 'ब्रहस्फुट' सिद्धान्त के प्रतिपादक श्री ब्रम्हभट्ट भी 628 ईस्वीं में चावडा क्षत्रिय शासकों के काल में भीनमाल में रहते थे।
यशोवर्मन मण्डौर से कुरुक्षेत्र चला गया। राष्ट्रीय संकट को देखते हुए भीनमाल की कमजोर स्थिति को ध्यान में रखकर नागभट्ट प्रथम ने आक्रमण कर वहां से चावड़ा क्षत्रियों के शासन को समाप्त कर भीनमाल पर अधिकार कर लिया तथा अपनी राजधानी मेड़ता के स्थान पर भीनमाल स्थानान्तरित कर ली। अब उसने विशाल शक्ति का संगठन कर प्रतिहार साम्राज्य की स्थापना की।
नागभट्ट प्रथम प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे। नागभट्ट को प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक भी माना जाता है। मण्डौर व मेड़ता तक केवल प्रतिहार ही थे। अब चूँकि गुर्जरात्रा प्रदेष का शासक हो गया, अतः यही से यह वंश गुर्जर - प्रतिहार कहलाने लगा। मण्डौर के शासक प्रतिहार ही कहलाते थे।
गुर्जरत्रा : , आनर्त, स्वर्भ, माहीघाटी, अनूप, वलभी, सौराष्ट्र, काठियावाड़, कच्छभुज, मण्डौर, जाँगल कूप दुर्ग आदि स्थानों से खदेड़ने का कार्य नागभट्ट प्रथम ने किया। लाट , थाना क्षेत्र से खदेड़ने का कार्य अवनिजनाश्रय पुलिकेशिन चालुक्य ने एवं मालवा, उज्जैन एवं सिंध से बाहर निकालने का कार्य सम्राट यशोवर्मन ने किया था।
भीनमाल को राजधानी बनाने के पश्चात नागभट्ट प्रथम ने पडोस में लगे राज्य जालौर पर अधिकार किया एवं वहां के सवर्णगिरी पर्वत पर एक शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग का निर्माण भी करवाया। उस समय जालौर में कौन शासन कर रहा था, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। "कुवलयमाला" ग्रन्थ से भी जालौर पर नागभट्ट प्रथम के अधिकार की पुष्टि उपलब्ध होती है।
उस समय प्रतिहार क्षत्रिय वंश का राज्य विस्तार बडे राज्यों तक फैल चुका था। उस समय के चारणो भाटों के अनुसार नागभट्ट प्रथम प्रतिहार वंश में जो तीनो तीनों लोको का रक्षक था नागभट्ट प्रथम नारायण की प्रतिकृति के रुप में उत्पन्न हुआ जिसने सुकृतियों का नाश करने वाले मलेच्छ नरेशों की अक्षौहिणी सेना का विनाश कर दिया। भयंकर अस्त्र शस्त्रों से वह चार भुजाओं से शोभित प्रतीत होता था। साक्षात नारायण (विष्णु) लगता था।"
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ वी के पांडे ने लिखा है -- अरबो के युद्ध का वर्णन हमे अरब लेखक बिलादुरी से भी प्राप्त होता है। उनका कथन है कि सिंध के गवर्नर जुनैद ने अनेक स्थानों पर विजय प्राप्त की जिसके पास दस लाख सैनिक रहे हो। उसने उज्जैन पर भी आक्रमण किया परंतु जुनैद के उत्तराधिकारी वहां हार गये।
जिससे भारत के अनेक भू भाग उसके हाथों से निकल गये। वह आंगे लिखता है। अरब लेखक बिलादुरी के इस कथन से विदित होता है। इतनी बडी विशाल सेना के वाबजूद जुनैद उज्जैन पर विजय प्राप्त नही कर सका। इसका प्रमुख कारण था कि इस समय उज्जैन का प्रमुख शक्तिशाली प्रतिहार क्षत्रिय शासक सम्राट नागभट्ट प्रथम था।
नागभट्ट प्रथम से अरबों का मुकाबला प्रमुख रुप से दो बार हुआ। एक मण्डौर में रहते हुए तथा दूसरा भड़ौच अथवा कच्छ भुज मे और दोनो ही बार जुनैद को बुरी तरह पराजित होना पडा था। अतः नागभट्ट का ऐसा कोप अरबों के मन में छा गया था कि वे उसका मुकाबला करने की सोच भी नही सकते थे। इसीलिए ग्वालियर प्रशस्ति में कहा गया है कि " मलेच्छा राजा की विशाल सेनाओं को चूर करने वाला मानो नारायण (विष्णु) रुप में वह लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था।"
प्रतिहार राजवंश के संस्थापक नागभट्ट प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण मारवाड जिसमें डीडवाना तक प्रदेश यानि वर्तमान नागौर जिले, गोंडवाना जिसमे जालौर एवं आबू आते थे। तथा उत्तरी गुजरात से लेकर भड़ौच तक का भू भाग आते थे। दक्षिणी राजस्थान का चित्तौड़ राज्य का शासक गोहिल क्षत्रिय राजपूत बप्पा रावल एवं सिंध का जय सिंह मित्र थे। उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन भी मित्र थे। इस प्रकार नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल के अंतर्गत अपने साम्राज्य को पर्याप्त शक्तिशाली बना लिया था। यह भारतीर पश्चिमी सीमा का वास्तविक प्रतिहार अर्थात रक्षक था।
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय राजपूत वंश
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जय माँ चामुण्डा देवी।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

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