Monday, April 18, 2016

==== क्षत्रिय_मिहिरभोज_प्रतिहार ====

                                         ==== क्षत्रिय_मिहिरभोज_प्रतिहार ====

 


** एक ऐसा राजा जिसने अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भागने पर विवश कर दिया और जिसके युग में भारत सोने की चिड़िया कहलाया **

मित्रों प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजपूत वंश के नवमी शताब्दी में सम्राट मिहिर भोज भारत का सबसे महान शासक था। उसका साम्राज्य आकार, व्यवस्था , प्रशासन और नागरिको की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चक्रवर्ती गुप्त सम्राटो के समकक्ष सर्वोत्कृष्ट था।

भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

चुम्बकीय व्यक्तित्व संपन्न सम्राट मिहिर भोज की बड़ी बड़ी भुजाये एवं विशाल नेत्र लोगों में सहज ही प्रभाव एवं आकर्षण पैदा करते थे। वह महान धार्मिक , प्रबल पराक्रमी , प्रतापी , राजनीति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ , उच्च संगठक सुयोग्य प्रशाशक , लोककल्याणरंजक तथा भारतीय संस्कृति का निष्ठावान शासक था।

ऐसा राजा जिसका साम्राज्य संसार में सबसे शक्तिशाली था। इनके साम्राज्य में चोर डाकुओ का कोई भय नहीं था। सुदृढ़ व्यवस्था व आर्थिक सम्पन्नता इतनी थी कि विदेशियो ने भारत को सोने की चिड़िया कहा।

यह जानकार अफ़सोस होता है की ऐसे अतुलित शक्ति , शौर्य एवं समानता के धनी मिहिर भोज को भारतीय इतिहास की किताबो में स्थान नहीं मिला।
सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार के शाशनकाल में सर्वाधिक अरबी मुस्लिम लेखक भारत भ्रमण के लिए आये और लौटकर उन्होंने भारतीय संस्कृति सभ्यता आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान विज्ञानं , आयुर्वेद , सहिष्णु , सार्वभौमिक समरस जीवन दर्शन को अरब जगत सहित यूनान और यूरोप तक प्रचारित किया।

क्या आप जानते हे की सम्राट मिहिर भोज ऐसा शासक था जिसने आधे से अधिक विश्व को अपनी तलवार के जोर पर अधिकृत कर लेने वाले ऐसे अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर पाँव नहीं रखने दिया , उनके सम्मुख सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो गए। उसकी शक्ति और प्रतिरोध से इतने भयाक्रांत हो गए की उन्हें छिपाने के लिए जगह ढूंढना कठिन हो गया था। ऐसा किसी भारतीय लेखक ने नहीं बल्कि मुस्लिम इतिहासकारो बिलादुरी सलमान एवं अलमसूदी ने लिखा है। ऐसे महान सम्राट मिहिर भोज ने 836 ई से 885 ई तक लगभग 50 वर्षो के सुदीर्घ काल तक शाशन किया।

सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी का जन्म रामभद्र प्रतिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। मिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया।

मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था। सम्राट मिहिर भोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक थे। मिहिर भोज शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है।

प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की।

49 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।सम्राट मिहिर भोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिर भोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।

सम्राट मिहिर भोज का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं पहला जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिर भोज मलेच्छों(मुगलो,अरबों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। दूसरा कारण सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जो कि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है।

इस दिन के 2 दिन बाद महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ हो जाता है। जिन स्थानों पर प्रतिहारों, परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, अन्य शाखाओं को सम्राट भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिर भोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।

अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिर भोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि प्रतिहार सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने
भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है।

मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रु उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर
कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की।

कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिर भोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।

किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार/ परिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है,
जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता था।।

मित्रों महान क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज की जयंती आगामी 4 सितंबर 2016 को है हम सभी पिछले साल की तरह ही इस साल भी बडे स्तर पर जयंती मानायेगे।।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
शेयर जरुर करें।।
नागौद रियासत।।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार काल के तांबे के सिक्के

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल के समय चलाये गये तांबे के सिक्के जो नवमीं शताब्दी में राज्य मुद्रा के रुप मे चलते थे।


प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय वंश।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजपूत।।
सम्राट मिहिर भोज।।
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद राज्य।।

== प्रतिहारकालीन जैन मंदिर ==

                                     == प्रतिहारकालीन जैन मंदिर ==


जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार क्षत्रिय शासकों द्वारा करवाया गया था।
वत्सराज प्रतिहार (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि प्रतिहारकालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये मंदिर महामारू अर्थात प्रतिहार शैली में निर्मित है।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

H.H. Maharaja Mahendra singh judev of Nagod Princely state

                                       == महाराजा महेन्द्र सिंह जूदेव नागौद ==


जन्म - 5 फरवरी 1916
शिक्षा - इंदौर एवं बँगलौर
राजगद्दी- 1926
पहला विवाह - महामान्या यशवंत कुमारी बाई जी राजे, धर्मपुर रियासत (गुजरात )1932 दूसरा विवाह - महामान्या श्याम कुमारी,ठिकाना बांधी, सोहावल रियासत 1942 व्यक्तित्व - सुंदर, सौम्य, सुशील, उदार, स्वाभिमानी, अच्छे घुड़सवार, संस्कृत के ज्ञाता, अंग्रेजी के विद्वान (धारा प्रवाह अंग्रेजी) हिन्दी के मर्मज्ञ, काव्य प्रेमी, संगीत प्रेमी, रास-रंग के शौकीन, अचूक निशाने बाज, बेढब शिकारी (256 शेर मारे, नागौद, उचेहरा, परसमनिया, इलाहाबाद, बाम्बे की कोठियाँ तरह -तरह की ट्राफी एवं खालों से सुसज्जित है।
खाद्यपदार्थ बनाने, खाने एवं खिलाने के शौकीन, उदार दाता (इनाम इकरार एवं जागीर देने में उदार। लोग जय जय कार करते परम शैव जो पिता श्री से विरासत में मिला, अच्छे पुजारी, अति क्रोधी (पर जल्दी शांत होते थे) अत्यन्त हठी (चाहे ब्रह्मा उतर आएं, करते मन की) रसज्ञ, अच्छे वक्ता, विशेष अवसरों पर परिधान खास होती ऐसे थे हमारे महाराजाधिराज ।
खानदानी उपाधि
"श्री श्री 108 श्री सदाशिव चरणार्विंद, मकर रन्द, श्री महीभुज मण्डल मार्तण्ड, श्री सूर्य वंश परिहार वतंशः, श्री महाराजधिराज, श्री महाराज संग्रामशूर, श्री बरमेन्द्र महाराज,
श्रीमान महेन्द्र सिंह जूदेव ।।"
आप महाराजा यादवेन्द्र सिंह जी के छोटे पुत्र है। अग्रज महाराजा नरहरेन्द्र सिंह जी की मृत्यु के बाद अवयस्क होने पर तत्कालीन राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था। आप का जन्म 8 फरवरी 1916 को हुआ और पढ़ाई इन्दौर और बैंगलोर मे संपन्न हुई।
वयस्क होने पर 9 फरवरी 1938 ई. को आपका राज्याभिषेक हुआ और 1939 ई. मे शेसन के अधिकार प्राप्त हुए। आप भारतीय नरेश मंडल के सदस्य भी थे।
आप ने हमेशा ही राज्य व प्रजा का तन मन धन से ख्याल रखा। आप नागौद राज्य के आखिरी उत्तराधिकारी हुए। 15 अगस्त 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हुआ। और सभी रियासतों के साथ नागौद रियासत भी अंततः अंतरमुक्त हो गया और कुछ ही सालों बाद आप 23 अक्टूबर 1981 ई. को 65 वर्ष की उम्र मे पंचतत्व विलीन हो गये।।
साभार - अजय सिंह परिहार
ठिकाना - सेमरी, नागौद
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
जय बरमेन्द्रनाथ।।
जय चामुण्डा देवी।।
सूर्यवंशी प्रतिहार वंश।।

History of Kshatriya Rajput Samrat Mahendrapal Pratihar

                                     ===== सम्राट_महेन्द्रपाल_प्रतिहार =====


आज की यह पोस्ट सूर्यवंशी क्षत्रिय मिहिर भोज प्रतिहार के पुत्र महेंद्रपाल प्रतिहार पर आधारित है।
प्रतिहार राजपूत सम्राट मिहिरभोज की मृत्यु (885 ईस्वीं) के पश्चात् उसका पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम उसके विशाल साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। उसकी माता का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। सम्राट मिहिर ने उसके शिक्षण के लिए उस काल के संस्कृत के महान पण्डित कविराज राजशेखर को नियुक्त किया था। कविराज राजशेखर ने अपनी रचनाओं में महेन्द्पाल को निर्भयराज, निर्भयनरेंद्र रघुकुल चूड़ामणि अथवा रघुकुलतिलक आदि विशेषणों से संबोधित किया है। साथ ही उसके अभिलेखों में महिन्द्रपाल, महेन्द्रायुद्ध एवं महिपाल नाम मिलते है।
सम्राट महेन्द्रपाल प्रतिहार भी अपने पिता मिहिरभोज के समान वीर, पराक्रमी, दूरदृष्टा एवं महत्वाकांक्षी शासक था। अपने पिता से मिले विशाल साम्राज्य की केवल सुरक्षा ही नहीं की अपितु उसे अधिक विस्तृत भी किया। अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि उसका साम्राज्य पूर्वी बंगाल से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक उत्तर पश्चिम् में वर्तमान अफगानिस्तान उत्तर (हिमालय) में कश्मीर से लेकर दक्षिण में विंध्याचल तक विशाल भू - भाग तक फैला हुआ था। उसके अभिलेखों में सम्राट योग्य उपमाएं परम भट्टारक ,महाराजाधिराज एवं परमेश्वर जैसी उपाधियाँ उसके नाम के साथ मिलती है।
सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम ने विरासत में मिले साम्राज्य की संपूर्ण व्यवस्था कर अपनी सेना एवं सेना सेनाध्यक्षों को विजय अभियान के लिए सजग किया। वह संपूर्ण उत्तरी भारत का एकछत्र सम्राट बनना चाहता था। एक विशेष बात यह थी कि महत्वाकांक्षी होने के वावजूद उसके मन मे विंध्याचल के दक्षिण मे अपने साम्राज्य को विस्तीर्ण करने की कोई आकांक्षा नही थी, अन्यथा यह समय उसके लिए दक्षिण के राज्यों को भी जीत सकने मे सुगम था क्योंकि उसके साम्राज्य के शत्रु राष्ट्रकूट शासक अत्यंत कमजोर थे तथा आपसी युद्धों में संलग्न थे। फिर भी उसने दक्षिण विजय की आकांक्षा पालने के स्थान पर उत्तर भारत में शासन की सुदृढ व्यवस्था एवं प्रजा के हितसंवर्धन में ही अपना ध्यान केंद्रित किया। 23 वर्षों के शासन काल में अपने सहयोगियों एवं मित्रों की संख्या में वृद्धि की, सीमाओं की सुरक्षा - व्यवस्था मजबूत की तथा अपने दोनों शक्तिशाली शत्रुओं -पाल एवं राष्ट्रकूटों की शक्ति एवं आकांक्षाओं को कुंठित किया।
सम्राट महेन्द्रपाल विद्याप्रेमी एवं विद्यानों, साहित्यकारों का आश्रयदाता भी था। उसकी राज्यसभा में संस्कृत का प्रसिद्व विद्वान कविराज राजशेखर रहता था। राजशेखर के प्रसिद्ध ग्रंथ कर्पूरमंजरी में कहा गया है कि वह महेन्द्रपाल प्रतिहार का गुरु था। महेन्द्रपाल प्रथम की मृत्यु के पश्चात वह उसके पुत्र प्रतिहार नरेश महिपाल का भी संरक्षक था।।
डॉ वी के पांडेय लिखते है - जिसका गुरु राजशेखर रहा हो वह योग्य एवं सुनिश्चित सम्राट न रहा हो ऐसा संभव ही नही है। वह विद्वानों का आश्रयदाता एवं साहित्य का संरक्षक था । वह एक शान्तिप्रिय नरेश था। उसने भारत देश के शत्रु अरब, हूण, शक, गुर्जर विदेशी आक्रमणकारियों को अपने पूर्वजों के भांति ही अपनी तलवार से उनका सर काटा था। उसने साथ ही साथ अन्य राजवंश पालवंश की शक्ति को भी क्षीण किया, परंतु राष्ट्रकूटों से जबरदस्ती उसने संघर्ष नहीं किया, जबकि इस समय राष्ट्रकूटों की आंतरिक स्थिति सन्तोषजनक न थी।
डॉ के सी श्रीवास्तव कहते है, " महेन्द्रपाल प्रतिहार न केवल एक विजेता एवं साम्राज्य निर्माता था, अपितु कुशल प्रशासक एवं विद्या और साहित्य का महान संरक्षक भी था।
इस प्रकार विभिन्न स्रोतों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है की महेन्द्रपाल के शासनकाल में राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दोनो ही दृस्टियों से प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की अभूतपूर्व प्रगति हुई। कन्नौज ने एक बार पुनः वही गौरव और प्रतिष्ठा प्राप्त कर लिया जो हर्षवर्धन के काल में उसे प्राप्त था। यह नगर जहां हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र बन गया वहीं कोई परिवर्तन नहीं, शक्ति और सौंदर्य में इसकी बराबरी करने वाला दूसरा नगर नही था। पश्चिमोत्तर एवं पश्चिम सीमा एकदम सुरक्षित रही।
महेन्द्रपाल प्रथम की अंतिम तिथि 907 - 908 ईस्वीं मिलती है। अतः माना जा सकता है कि महेन्द्रपाल की मृत्यु 908 ईस्वीं के लगभग हुई थी।
885 ईस्वीं से 908 ईस्वीं अथवा 910 ईस्वीं का एक ऐसा कालखण्ड था जब सम्राट महेन्द्रपाल प्रतिहार को चुनौती देने वाला भारत ही नही भारत के बाहर भी दुनिया में कोई राज्य नही था। यह एक ऐसा समय था जब सम्राट महेन्द्रपाल प्रथम इतना शक्तिशाली था कि वह उत्तर - पश्चिम एशिया में अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकता था। इस साम्राज्य - विस्तार से भविष्य के लिए भी भारत पर किसी आक्रमण की संभावना नही रहती। परंतु ऐसा सोचा ही नही गया क्योंकि भारतीय क्षत्रिय राजपूत शासको की मानसिकता हमेशा सुरक्षात्मक रही है। आक्रमकता की कभी नही रही। वे जीवो और जीने दो के सिद्धांत पर विश्वास करते थे।
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
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प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय राजपूत वंश
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

History of Kshatriya samrat Naagbhatt Pratihar

===== सम्राट_नागभट्ट_प्रतिहार =====


लक्ष्मणवंशी प्रतिहार क्षत्रिय वंश का वस्तुतः राजनैतिक इतिहास प्रमुख रुप से इसके संस्थापक नागभट्ट प्रथम से प्रारम्भ होता है। नागभट्ट प्रथम के परदादा महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का समय डॉ बैजनाथ के अनुसार छठी शताब्दी के आसपास था। डॉ के सी श्रीवास्तव के अनुसार इस वंश की प्राचीनता पांचवीं सदी तक जाती है। पुलिकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख के 22 वें श्लोक में गुर्जरात्रा प्रदेष (वर्तमान का गुजरात) भड़ौच का उल्लेख सर्वप्रथम हुआ।
महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का पुत्र रज्जिल, रज्जिल का पुत्र नरभट एवं नरभट का पुत्र नागभट्ट था। इस आधार पर इतिहासकार नागभट्ट का काल 730 ई. से प्रारम्भ मानते है। 730 ई. वह कालखण्ड था। जब नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल पर अधिकार कर वास्तविक रुप से प्रतिहार साम्राज्य का श्री गणेश किया था। उस समय नागभट्ट पूर्णयुवावस्था में था।
नागभट्ट के पिता नरभट मण्डौर के शासक थे। लगभग 725 ईस्वीं के आसपास अरब के मुस्लिमों ने सिंध व मुल्तान पर अधिकार करने के पश्चात मण्डौर राज्य पर आक्रमण किया था। परंतु राजकुमार नागभट्ट ने आंगे बढकर अरबों प्रत्याक्रमण कर उन्हें बुरी तरह पराजित किया तथा पलायन करने पर बाध्य किया। अरब सेनाएँ मण्डौर को छोडकर भीनमाल की ओर बढ गई। उस समय उनका अरब सेनापति जुनैद था।
अरब सेनापति जुनैद मण्डौर के प्रतिहार क्षत्रियों से हार पिटकर पराजित होने के बाद भीनमाल की ओर बढा। उस समय भीनमाल मे चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। यहां का शासक कमजोर था। अतः अरबो ने इसे जीत लिया तथा वे उज्जैन की ओर आंगे बढे। बिलादुरी ने अपने ग्रन्थ में लिखा है--- अरब सेनापति जुनैद खां ने उज्जैन, बहरीमद, अलमालिवह (मालवा), मारवाड़, वलमण्डल, दहनाज और बरवास (भड़ौच) पर आक्रमण किये। उसने भीनमाल पर पर अधिकार किया।
इससे सपष्ट है कि इन आक्रमणों में उसे केवल भीनमाल पर ही सफलता मिली। उज्जैन उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन के शासनाअंतर्गत था। गौडवहों के अनुसार अरबों के आक्रमण की जानकारी मिलते ही यशोवर्मन महेन्द्र पर्वतीय राजाओं की विजय यात्रा को बीच में छोडकर सीघा मध्य देश को पार करते हुए उज्जैन आकर अरबी सेनाओं पर प्रत्याक्रमण किया।
आक्रमण इतना जबरदस्त था कि अरबों के पांव उखड गये। उसने उनका पीछा करते हुए अनेक युद्धों में पराजित करते हुए सिंध के पार खदेड़ दिया। अब केवल मकरान ही अरबों के पास रह गया। वहाँ से यशोवर्मन मण्डौर गया। वहां उसका स्वागत हुआ। ऐसा लगता है कि नागभट्ट प्रथम को उसने भीनमाल मजबूत करने के लिए कहा।
उस काल में भीनमाल का बहुत ही महत्व था क्योंकि सिंध में भीनमाल होकर ही मालवा व कन्नौज मध्यदेश में जाया जा सकता था। चीनी यात्री हुऐनसांग 641 ईस्वीं में भीनमाल गया था। उस समय वहाँ चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। शिशुपाल वध के लेखक महाकवि माघ एवं 'ब्रहस्फुट' सिद्धान्त के प्रतिपादक श्री ब्रम्हभट्ट भी 628 ईस्वीं में चावडा क्षत्रिय शासकों के काल में भीनमाल में रहते थे।
यशोवर्मन मण्डौर से कुरुक्षेत्र चला गया। राष्ट्रीय संकट को देखते हुए भीनमाल की कमजोर स्थिति को ध्यान में रखकर नागभट्ट प्रथम ने आक्रमण कर वहां से चावड़ा क्षत्रियों के शासन को समाप्त कर भीनमाल पर अधिकार कर लिया तथा अपनी राजधानी मेड़ता के स्थान पर भीनमाल स्थानान्तरित कर ली। अब उसने विशाल शक्ति का संगठन कर प्रतिहार साम्राज्य की स्थापना की।
नागभट्ट प्रथम प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे। नागभट्ट को प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक भी माना जाता है। मण्डौर व मेड़ता तक केवल प्रतिहार ही थे। अब चूँकि गुर्जरात्रा प्रदेष का शासक हो गया, अतः यही से यह वंश गुर्जर - प्रतिहार कहलाने लगा। मण्डौर के शासक प्रतिहार ही कहलाते थे।
गुर्जरत्रा : , आनर्त, स्वर्भ, माहीघाटी, अनूप, वलभी, सौराष्ट्र, काठियावाड़, कच्छभुज, मण्डौर, जाँगल कूप दुर्ग आदि स्थानों से खदेड़ने का कार्य नागभट्ट प्रथम ने किया। लाट , थाना क्षेत्र से खदेड़ने का कार्य अवनिजनाश्रय पुलिकेशिन चालुक्य ने एवं मालवा, उज्जैन एवं सिंध से बाहर निकालने का कार्य सम्राट यशोवर्मन ने किया था।
भीनमाल को राजधानी बनाने के पश्चात नागभट्ट प्रथम ने पडोस में लगे राज्य जालौर पर अधिकार किया एवं वहां के सवर्णगिरी पर्वत पर एक शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग का निर्माण भी करवाया। उस समय जालौर में कौन शासन कर रहा था, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। "कुवलयमाला" ग्रन्थ से भी जालौर पर नागभट्ट प्रथम के अधिकार की पुष्टि उपलब्ध होती है।
उस समय प्रतिहार क्षत्रिय वंश का राज्य विस्तार बडे राज्यों तक फैल चुका था। उस समय के चारणो भाटों के अनुसार नागभट्ट प्रथम प्रतिहार वंश में जो तीनो तीनों लोको का रक्षक था नागभट्ट प्रथम नारायण की प्रतिकृति के रुप में उत्पन्न हुआ जिसने सुकृतियों का नाश करने वाले मलेच्छ नरेशों की अक्षौहिणी सेना का विनाश कर दिया। भयंकर अस्त्र शस्त्रों से वह चार भुजाओं से शोभित प्रतीत होता था। साक्षात नारायण (विष्णु) लगता था।"
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ वी के पांडे ने लिखा है -- अरबो के युद्ध का वर्णन हमे अरब लेखक बिलादुरी से भी प्राप्त होता है। उनका कथन है कि सिंध के गवर्नर जुनैद ने अनेक स्थानों पर विजय प्राप्त की जिसके पास दस लाख सैनिक रहे हो। उसने उज्जैन पर भी आक्रमण किया परंतु जुनैद के उत्तराधिकारी वहां हार गये।
जिससे भारत के अनेक भू भाग उसके हाथों से निकल गये। वह आंगे लिखता है। अरब लेखक बिलादुरी के इस कथन से विदित होता है। इतनी बडी विशाल सेना के वाबजूद जुनैद उज्जैन पर विजय प्राप्त नही कर सका। इसका प्रमुख कारण था कि इस समय उज्जैन का प्रमुख शक्तिशाली प्रतिहार क्षत्रिय शासक सम्राट नागभट्ट प्रथम था।
नागभट्ट प्रथम से अरबों का मुकाबला प्रमुख रुप से दो बार हुआ। एक मण्डौर में रहते हुए तथा दूसरा भड़ौच अथवा कच्छ भुज मे और दोनो ही बार जुनैद को बुरी तरह पराजित होना पडा था। अतः नागभट्ट का ऐसा कोप अरबों के मन में छा गया था कि वे उसका मुकाबला करने की सोच भी नही सकते थे। इसीलिए ग्वालियर प्रशस्ति में कहा गया है कि " मलेच्छा राजा की विशाल सेनाओं को चूर करने वाला मानो नारायण (विष्णु) रुप में वह लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था।"
प्रतिहार राजवंश के संस्थापक नागभट्ट प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण मारवाड जिसमें डीडवाना तक प्रदेश यानि वर्तमान नागौर जिले, गोंडवाना जिसमे जालौर एवं आबू आते थे। तथा उत्तरी गुजरात से लेकर भड़ौच तक का भू भाग आते थे। दक्षिणी राजस्थान का चित्तौड़ राज्य का शासक गोहिल क्षत्रिय राजपूत बप्पा रावल एवं सिंध का जय सिंह मित्र थे। उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन भी मित्र थे। इस प्रकार नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल के अंतर्गत अपने साम्राज्य को पर्याप्त शक्तिशाली बना लिया था। यह भारतीर पश्चिमी सीमा का वास्तविक प्रतिहार अर्थात रक्षक था।
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प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय राजपूत वंश
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जय माँ चामुण्डा देवी।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

History of Kakustha Pratihar and Devraj Pratihar

===== महाराजा देवराज प्रतिहार =====
मित्रों आज की यह पोस्ट लक्ष्मणवंशी प्रतिहार/परिहार राजपूत वंश के वीर योद्धा शासक देवराज परिहार पर आधारित है।


क्षत्रिय नरेश नागभट्ट प्रथम की मृत्यु 760 ईस्वीं में होने के पश्चात उसके भाई का पुत्र ककुक्क अथवा कक्कुस्थ प्रतिहार सिंहासन पर बैठा परंतु कक्कुस्थ एक निर्बल एवं अयोग्य शासक होने के कारण शीघ्र ही उसके स्थान पर उसका छोटा भाई देवराज सिंघासन पर बैठा।
कक्कुस्थ के विषय मे कोई विशेष घटनाओं की जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। कक्कुस्थ के कोई संतान न होने की वजह से भी उसका छोटा भाई ही शासक बना। ग्वालियर प्रशस्ति में कक्कुस्थ के विषय में लिखा है कि वह प्रियभाषी होने के कारण वह लोक मे कक्कुस्थ (हँसने वाला) नाम से जाना गया।
यह तो नही कहा जा सकता कि इसने कितने वर्ष तक शासन किया क्योंकि इससे संबंधित कोई साक्ष्य नही मिलता। परंतु ऐसा लगता है की अत्यंत अल्प समय ही यह शासनाधिकारी रहा होगा।"
कक्कुस्थ के बाद उसका छोटा भाई देवराज ने प्रतिहार राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। ग्वालियर प्रशस्ति कहती है कि " उसके पराक्रमी अनुज देवराज ने कुल यश की वृद्धि की तथा पृथ्वी के राजाओं की प्रभुता का विनाश करके उन्हें उसी प्रकार प्रभुत्वविहीन कर दिया, जिस प्रकार इन्द्र ने पर्वतो के पंखो को काटकर गतिहीन बना दिया था। इसका तात्पर्य है कि देवराज वीर योग्य शासक था। प्रशस्ति में इसे 'कुलिश - धर' याने इन्द्र के समान कहा गया है।
मिहिर भोज प्रथम के वराह अभिलेख में देवराज को देवशक्ति कहा गया है। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार देवराज ने बहुसंख्यक भूभृतों यानी राजाओं और उनके शक्तिशाली सहयोगियों की गति को समाप्त कर दिया। " यज्ञे छिन्नोरुपक्षक्षपितगतिकुलं भूभृतं सन्नीयनता।" अभिलेख में शत्रुओं एवं उनके सहयोगियों के नामों का उल्लेख नहीं है।
अतः निश्चित रुप से कुछ नही कहा जा सकता। परंतु यह तो निश्चित है कि देवराज प्रतिहार ने अपने पूर्वजों के साम्राज्य की सीमाओं को कम नही होने दिया। बीस वर्ष तक शासन चलाना और वह भी उज्जैन जैसे केंद्रीय स्थान पर रहकर जहाँ दक्षिण एवं पश्चिम के आक्रमणों का निरंतर भय बना रहता था।, आसान काम नही था परंतु देवराज ने निर्बाध गति से शासन चलाया।
दुरदेव से इसके शासन के विषय में अधिक जानकारी आज हमें उपलब्ध नहीं है। कक्कुस्थ एवं देवराज ने बीस वर्ष शासन किया। देवराज प्रतिहार की मृत्यु 776 ईस्वीं मे हो गई।
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय राजपूत वंश
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‪#‎kakkustha‬ ‪#‎Devraj‬
‪#‎Ujjain‬ ‪#‎Nagod‬
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

Sunday, April 10, 2016

prithviraj Chouhan or chahman Kshatriya Rajputs they are not gujjar or Gurjar

~~कृपया सभी लोग इस को जरूर पढ़े~~


जैसा की सभी को पता है की विदेशी गूँजरो के द्वारा क्षत्रिय राजपूतों के इतिहास को अपना बनाने का अभियान चलाया जा रहा हैँ। ये लोग प्रतिहार/परिहार, तंवर, सोलंकी, चौहान जैसे सभी राजपूत वंशो को गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। यहाँ तक की ये अब महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान को भी गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैँ। इसी कड़ी में पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित करने के लिए एक नया शिगूफा इन्होंने छोड़ा हैँ। इसे यहाँ पर पढ़े-
https://m.facebook.com/story.php…
गूजरो में चौहान लगाने वाले उत्तर प्रदेश के शामली जिले में और हरयाणा के करनाल में मिलते है। ये लोग राजपूत राजा राणा हर राय चौहान जी की गूजरी रखैल की सन्तान हैँ जिसके बारे में खुद इनके बुजुर्ग बताते थे। इन्हें कलसलान गूजर भी कहा जाता हैँ। ये पहले चौहान नही लगाते थे लेकिन अब लगाने लगे हैँ। इनके बुजुर्ग खुद अंग्रेज़ो को ये बता के गए थे की ये राजपूतों की नाजायज़ औलाद है और करनाल और मुजफ्फरनगर district gazetteers में ये साफ़ साफ़ लिखा है, और भी कई किताबो में इस पर लिखा हुआ है।
इन मुट्ठीभर चौहान गूजरो के दम पर ही गूजर चौहान वंश को गूजरो का वंश और पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैँ। इन भैंस चोरों ने जो नई theory गढ़ी है उसके अनुसार राणा हर राय चौहान पृथ्वीराज के भाई थे और उनके वंशज कैराना में आकर बसे जो आज चौहान गूजर हैँ और जो राजपूत चौहान है वो गोले है। इन गधों को इतना नहीँ मालूम कि राणा हर राय पृथ्वीराज चौहान से भी 200 साल पहले हुए थे, जो नीमराणा से उत्तरी हरयाणा आए थे और पृथ्वीराज के भाई का नाम हरिराज था जिन्होंने अजमेर में गौरी से लड़ते हुए अपने पूरे परिवार के साथ जान दे दी थी। उनका कोई वंशज नही था। पृथ्वीराज का वंश गोविन्दराज से चला जिन्होंने रणथम्भोर में राज्य स्थापित किया।
ये सब बाते बताकर किसी को नीचा दिखाने का हमें कोई शौक नहीँ हैँ लेकिन इन गूँजरो ने हमें बहस के दौरान चुनौती दी है की ये 2 साल के अंदर पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित कर के दिखाएंगे। इसके जवाब में हमने भी चुनौती दी है की तुम तो कभी पृथ्वीराज को गूजर साबित नहीँ कर पाओगे लेकिन अब हम इन कलसलान गूजरों के चौहान राजपूतों की रखैल की सन्तान होने की बात सबूतों के साथ हर व्यक्ति तक जरूर पंहुचा देंगे।
इसलिये इस msg को ज्यादा से ज्यादा फैला दो जिससे इन दूधियों की असलियत दुनिया को पता चले।
करनाल gazetteer का लिंक यहाँ है-http://revenueharyana.gov.in/html/mainchild/gazetteers.htm
मुजफ्फरनगर gazetteer के लिये लिंक-http://www.muzaffarnagar.nic.in/CHAPTER%20III.HTM

Pratihar\Parihar Kshatriya Rajputs are Laxmanvanshi *** प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश *** ** लक्ष्मणवंशी प्रतिहार **

                                            *** प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश ***
                                                    ** लक्ष्मणवंशी प्रतिहार **


मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको प्रतिहार क्षत्रिय वंश के राज्य व ठिकानों की जानकारी देंगे।।
प्रतिहार एक ऐसा वंश है जिसकी उत्पत्ति पर कई महान इतिहासकारों ने शोध किए जिनमे से कुछ अंग्रेज भी थे और वे अपनी सीमित मानसिक क्षमताओं तथा भारतीय समाज के ढांचे को न समझने के कारण इस वंश की उतपत्ति पर कई तरह के विरोधाभास उतपन्न कर गए। प्रतिहार एक शुद्ध क्षत्रिय वंश है जिसने गुर्जरादेश से गुज्जरों को खदेड़ने व राज करने के कारण गुर्जरा सम्राट की भी उपाधि पाई।
मनुस्मृति में प्रतिहार,परिहार, पढ़ियार तीनों शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज
विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक,
हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की
ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी
ही लिखा गया है।
लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे,
उन्ही के वंशज परिहार है। इस वंश की 126वीं पीढ़ी में राजा हरिश्चन्द्र प्रतिहार का उल्लेख मिलता है। इनकी दूसरी पत्नी भद्रा से चार पुत्र थे।जिन्होंने कुछ धनसंचय और एक सेना का संगठन कर अपने पूर्वजों का राज्य माडव्यपुर को जीत लिया और मंडोर राज्य का निर्माण किया, जिसका राजा रज्जिल बना।इसी का पौत्र नागभट्ट प्रतिहार था, जो अदम्य साहसी,महात्वाकांक्षी और असाधारण योद्धा था।
इस वंश में आगे चलकर कक्कुक राजा हुआ, जिसका राज्य पश्चिम भारत में सबल रूप से उभरकर सामने आया। पर इस वंश में प्रथम उल्लेखनीय राजा नागभट्ट प्रथम है, जिसका राज्यकाल 730 से 760 माना जाता है। उसने जालौर को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली परिहार राज्य की नींव डाली। इसी समय अरबों ने सिंध प्रांत जीत लिया और मालवा और गुर्जरात्रा राज्यों पर आक्रमण कर दिया। नागभट्ट ने इन्हे सिर्फ रोका ही नहीं, इनके हाथ से सैंनधन,सुराष्ट्र, उज्जैन, मालवा भड़ौच आदि राज्यों को मुक्त करा लिया। 750 में अरबों ने पुनः संगठित होकर भारत पर हमला किया और भारत की पश्चिमी सीमा पर त्राहि-त्राहि मचा दी। लेकिन नागभट्ट कुद्ध्र होकर गया और तीन हजार से ऊपर डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया जिससे देश ने राहत की सांस ली।
इसके बाद इसका पौत्र वत्सराज (775 से 800) उल्लेखनीय है, जिसने परिहार साम्राज्य का विस्तार किया। उज्जैन के शासन भण्डि को पराजित कर उसे परिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।उस समय भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थी। परिहार साम्राज्य-उज्जैन राजा वत्सराज, 2 पाल साम्राज्य-गौड़ बंगाल राजा धर्मपाल, 3
राष्ट्रकूट साम्राज्य-दक्षिण भारत राजा
धु्रव । अंततः वत्सराज ने पाल धर्मपाल पर आक्रमण कर दिया और भयानक युद्ध में उसे पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने को विवश किया। लेकिन ई. 800 में धु्रव और धर्मपाल की संयुक्त सेना ने वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन एवं उसकी उपराजधानी कन्नौज पर पालों का अधिकार हो गया।
लेकिन उसके पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने उज्जैन को फिर बसाया। उसने कन्नौज पर आक्रमण उसे पालों से छीन लिया और कन्नौज को अपनी प्रमुख राजधानी बनाया। उसने 820 से 825-826 तक दस भयावाह युद्ध किए और संपूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इसने यवनों, तुर्कों को भारत में पैर नहीं जमाने दिया। नागभट्ट का समय उत्तम
शासन के लिए प्रसिद्ध है। इसने 120 जलाशयों का निर्माण कराया-लंबी सड़के बनवाई। अजमेर का सरोवर उसी की कृति है, जो आज पुष्कर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां तक कि पूर्व काल में राजपूत योद्धा पुष्पक सरोवर पर वीर पूजा के रूप में नाहड़राव नागभट्ट की पूजा कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे।
उसकी उपाधि ‘‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी। नागभट्ट के पुत्र रामभद्र ने साम्राज्य सुरक्षित रखा। इनके पश्चात् इनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध मिहिर भोज साम्राट बना, जिसका शासनकाल 836 से 885 माना जाता है। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से
चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी।
अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
इतने विशाल और विस्तृत साम्राज्य का प्रबंध
अकेले सुदूर कन्नौज से कठिन हो रहा था। अस्तु भोज ने साम्राज्य को चार भागो में बांटकर चार उप राजधानियां बनाई। कन्नौज- मुख्य राजधानी, उज्जैन और मंडोर को उप राजधानियां तथा ग्वालियर को सह
राजधानी बनाया। प्रतिहारों का नागभट्ट
के समय से ही एक राज्यकुल संघ था, जिसमें कई राजपूत राजें शामिल थे। पर मिहिर भोज के समय बुंदेलखण्ड और कांलिजर मण्डल पर चंदलों ने अधिकार जमा रखा था। भोज का प्रस्ताव था कि चंदेल भी राज्य संघ के सदस्य बने, जिससे सम्पूर्ण उत्तरी पश्चिमी भारत एक विशाल शिला के रूप में खड़ा हो जाए और यवन, तुर्क, हूण आदि शत्रुओं को भारत प्रवेश से पूरी तरह रोका जा सके। पर चंदेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। अंततः मिहिर भोज ने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया
और इस क्षेत्र के चंदेलों को हरा दिया।
मिहिर भोज परम देश भक्त था-उसने प्रण किया था कि उसके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसके लिए उसने सबसे पहले आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण लेने देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय
मिहिर भोज को जाता है। मिहिर भोज के
शासन काल में कन्नौज साम्राज्य की सीमा
रमाशंकर त्रिपाठी की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ
कन्नौज, पेज 246 में, उत्तर पश्चिम् में सतलज नदी तक, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण पूर्व में बुंदेलखण्ड और वत्स राज्य तक, दक्षिण पश्चिम में सौराष्ट्र और राजपूतानें के अधिक भाग तक विस्तृत थी। सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि मिहिर भोज अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है।
सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिन्दोस्ता
की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-
इसमें हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों
रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। भोज का तृतीय अभियान पाल राजाओ के विरूद्ध हुआ। इस समय बंगाल में पाल वंश का शासक देवपाल था। वह वीर और यशस्वी था- उसने अचानक कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और कालिंजर में तैनात भोज की सेना को परास्त कर किले पर कब्जा कर लिया। भोज ने खबर पाते ही देवपाल को सबक सिखाने का निश्चय किया। कन्नौज और ग्वालियर दोनों सेनाओं को इकट्ठा होने का आदेश दिया और चैत्र मास सन् 850 ई. में देवपाल पर आक्रमण कर दिया। इससे देवपाल की सेना न केवल पराजित होकर बुरी तरह भागी, बल्कि वह मारा भी गया। मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो
गये।
इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने
उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया। तदनन्तर टक्क देश के शंकर
वर्मा को हराकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत को
कन्नौज साम्राज्य का अंग बना लिया। चतुर्थ
अभियान में भोज ने परिहार राज्य के मूल राज्य मण्डोर की ओर ध्यान दिया। त्रर्वाण,बल्ल और माण्ड के राजाओं के सम्मिलित ससैन्य बल ने मण्डोर पर आक्रमण कर दिया। मण्डोर का राजा बाउक पराजित ही होने वाला था कि भोज ससैन्य सहायता के लिए पहुंच गया। उसने तीनों राजाओं को बंदी बना लिया और उनका राज्य कन्नौज में मिला लिया। इसी अभियान में उसने गुर्जरात्रा, लाट, पर्वत आदि राज्यों को भी समाप्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया।
---प्रतिहार/परिहार वंश की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत
साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन
इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार राजपूतों के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।
मण्डौर, राजस्थान
जालौर, राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान
पाली, राजस्थान
बेलासर, राजस्थान
कन्नौज, उतर प्रदेश
हमीरपुर उत्तर प्रदेश
प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश
झगरपुर, उत्तर प्रदेश
उरई, उत्तर प्रदेश
उन्नाव, उतर प्रदेश
ग्वालियर, मध्य प्रदेश 
उज्जैन, मध्य प्रदेश 
चंदेरी, मध्य प्रदेश
जिगनी, मध्य प्रदेश
अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश
उचेहरा, मध्य प्रदेश
दमोह, मध्य प्रदेश
सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश
एकलबारा, गुजरात
मियागाम, गुजरात
कर्जन, गुजरात
काठियावाड़, गुजरात
दुधरेज, गुजरात
खनेती, हिमाचल प्रदेश
कुमहारसेन, हिमाचल प्रदेश
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य
वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़,रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरयाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मडाढ के नाम से उत्तर हरयाणा में मिलती है। राजस्थान के सीकर से ही राघवो की एक शाखा सिकरवार निकली है जिसका फतेहपुर सिकरी पर राज था और जो आज उत्तर प्रदेश,बिहार और मध्यप्रदेश में विशाल संख्या में मिलते हैँ। विश्व का सबसे बड़ा गाँव उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का गहमर सिकरवार राजपूतो
का ही है। उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा,राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था अच्छी संख्या में हैँ ।। मित्रों आइए अब जानते है प्रतिहार/परिहार वंश की शाखाओं के बारे में।
भारत में परिहारों की 32 शाखा है। जो अभी तक की जानकारी मे है जिसमे इन शाखाओं की भी कई उप शाखाएँ है। जिससे आज प्रतिहार/परिहार वंश पूरे भारत वर्ष में फैल गये।
== प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==
(1) डाभी
(2) बडगुजर (राघव)
(3) मडाड और खडाड
(4) इंदा
(5) लल्लुरा / लूलावत
(6) सूरा
(7) रामेटा / रामावत
(8) बुद्धखेलिया
(9) खुखर
(10) सोधया
(11) चंद्र
(13) माहप
(14) धांधिल
(15) सिंधुका
(16) डोरणा
(17) सुवराण
(18) कलाहँस
(19) देवल
(20) खरल
(21) चौनिया
(22) झांगरा
(23) बोथा
(24) चोहिल
(25) फलू
(26) धांधिया
(27) खखढ
(28) सीधकां
(29) कमाष / जेठवा
(30) सिकरवार
(31) तखी
(32) परहार
ये सभी परिहार राजाओं अथवा परिहार ठाकुरों से निकलकर बनी है। आइए अब जानते है प्रतिहार वंश के महान योद्धा शासको के बारे में जिन्होंने अपनी मातृभूमि, प्रजा व राज्य के लिए सदैव ही न्यौछावर थे।
** प्रतिहार/परिहार वंश के महान राजा **
(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
नोट :- प्रतिहार/परिहार / पढ़ियार जो कि गुर्जरात्रा प्रदेश में राज किया उस वजह से प्रतिहार वंश को कुछ इतिहासकारों ने उनके नाम के साथ गुर्जर शब्द प्रयोग कर दिया है। जिससे कबीलेवादी गुज्जर समाज के लोग प्रतिहार राजपूतों को गुज्जर मूल का घोषित करने मे मुहिम सी छेड रखी है। आप सभी भी इसपर कडा विरोध करे।
ज्यादा जानकारी के लिए पेज लाइक करें।
https://m.facebook.com/Nagod-Riyasat-1380652895550208/
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

Exposing gujjar\gurjar गुर्जर\गुज्जर जाति समाज में इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर अन्य क्षत्रिय राजपूत वंश को गुर्जर मूल का बता रही है!

‪#‎गूजर‬ ख़ुद को ‪#‎विदेशी‬ से ‪#‎क्षत्रिय‬ स्वघोषित करने में कर रहे है लाखों खर्च.....










मित्रों आज कल गूजर- शोसल मीडिया पर हमारे पूर्वजों को गुर्जर घोषित कर रहे है।
इन लोगो ने मेरे फेसबुक पेज, पर बनाई गई कई प्रतिहार/परिहार वंश की पोस्ट को कापी कर और प्रतिहार/परिहार की जगह गुर्जर जोड दिया है आप सभी इनकी कारस्तानी देख सकते है और गलत रेफरेंस भी दे दिया है। अरे गूजरों मानलो की हम ही है तुम्हारे बाप है। मैने कई रेफरेंस भी मिलाये पर कोई भी सही नही था।
नीचे यह है उस फेसबुक पेज की लिंक जिसमे गुर्जर अपने को महान बता रहे है। और सभी क्षत्रिय वंश को गुज्जर मूल का बता रहे हैं।
(1) Original post link :- यह मेरे फेसबुक पेज नागौद रियासत के वह पोस्ट की लिंक है जो मैने बनाई है। नीचे लिंक है इसी पोस्ट की जिसे गुज्जरों ने अपने पेज पर इडिट किया है।
== (1) Edit by gujjar गुज्जरो दवारा - मेरी पोस्ट के साथ छेड़छाड़ का लिंक उस पोस्ट की है जिसे गुज्जरों ने इडिट किया है
(2) Original post link - यह पोस्ट मैने बनाया था। पोस्ट का टाइटल था " जालौर किले का इतिहास" जिसे गुज्जरों ने छेडछाड कर प्रतिहार/परिहार की जगह गुर्जर जोड दिया है। नीचे इसी पोस्ट का लिंक है जो गुर्जर अपने पेज पर हमे बदनाम कर रहे है
== (2) edit by gujjars गुज्जरों द्वारा- यह दूसरी लिंक है देखिए कैसे गुज्जरों ने छेडछाड की है हमारे इतिहास के साथ
ये वो महान योद्धा और क्षत्रिय वंश के राजपूत है जिसे गूजर लोग गूजर मूल बता रहे है
नागभट्ट प्रतिहार
मिहिर भोज प्रतिहार
वत्सराज प्रतिहार
पृथ्वीराज चौहान
छत्रपति शिवाजी
बप्पा रावल
इनके अलावा चौहान, परमार, सोलंकी, बाघेला, राठौर, गुहिलौत, तंवर वंश को भी गुर्जर बता रहे है
और पूरे प्रतिहार वंश को ही गुर्जर बता रहे
कुछ पिक्चर भेज रहा हूँ जरुर देखे
---- गू जरों से सवाल ----
1- प्रतिहार सम्राटो ने कन्नौज को राजधानी बनाकर पुरे उत्तर भारत में राज किया था। इनका राज बिहार मालवा तक था। उनके वंशज आज के प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार राजपूत हैं जो कन्नौज बिहार पूर्वी यूपी राजस्थान गुजरात सब जगह मिलते हैं पर गुज्जर जाति को कन्नौज में और ईस्ट यूपी बिहार गुजरात में कोई नही जानता। ऐसा क्यों ?
2-अगर प्रतिहार/परिहार गुज्जर थे तो कन्नौज और उसके आस पास कोई गुज्जर क्यों नही है?
3-गुर्जरों में प्रतिहार नाम का कोई वंश क्यूँ नही है? जबकि क्षत्रिय राजपूतो में लाखो की संख्या में प्रतिहार/परिहार वंश है।
4-प्रतिहारो का गोत्र कौशिक था जो आज भी प्रतिहार राजपूतो का गोत्र है।
अगर गुर्जर क्षत्रिय थे तो दुसरी द्विज जातियों जैसे ब्राह्मण राजपूत वैश्य की तरह गुज्जरो का कोई ऋषि गोत्र क्यों नही है?जबकि उस समय प्रतिहारो का गोत्र कश्यप था और आज भी है।
पहले चौहानो का गोत्र वत्स था और आज भी वत्स है। गुज्जरो का क्यूँ नही है?
5-अगर गूजर मिहिरभोज नागभट्ट को अपना पुरखा मानते हैं तो किसी गुज्जर को अंग्रेजो और भंडारकर जैसो की बकचोदी से पहले ये जानकारी क्यों नही थी क्योंकि उससे पहले गुजर खुद को ब्रिटिश गजेटियरो के अनुसार राजपूतो की नाजायज औलाद मानते थे।
मिहिरभोज के 1000 साल बाद अचानक से गूजरों को ब्रह्मज्ञान हो गया कि मिहिरभोज तुम्हारे पुरखे थे????
उससे पहले क्यों नही पता था??
पुरखे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को इतिहास की मौखिक जानकारी जरूर देते हैं पर तुम्हारे पुरखे तो तुम्हे बस भैंस चोरी की कहानियां ही सुनाते थे अब तुम अचानक से प्रतिहार/परिहार बन गए???~??~
6- प्रतिहारो/परिहारों के गल्लका के शिलालेख में स्पष्ट लिखा है के प्रतिहार सम्राट नागभट्ट जिन्हें गुर्जरा प्रतिहार वंश का संस्थापक भी माना जाता है ने गुर्जरा राज्य पर हमला कर गुज्जरों को गुर्जरा देश से बाहर खदेड़ा व अपना राज्य स्थापित किया... अगर प्रतिहार गुज्जर थे तो खुद को ही अपने देश में हराकर बाहर क्यों खड़ेंगे ?? मिहिर भोज के पिता प्रतिहार क्षत्रिय और पुत्र गुज्जर कैसे ??
7- हरश्चरित्र में गुजरादेश का जिक्र बाण भट्ट ने एक राज्य एक भू भाग के रूप में किया है यही बात पंचतंत्र और कई विदेशी सैलानियों के रिकार्ड्स में भी पुख्ता होती है। इस गुर्जरा देस में गुज्जरों को खदेड़ने के बाद जिस भी वंश ने राज्य किया गुर्जरा नरपति या गुर्जर नरेश कहलाया। यदि गुज्जर विदेशी जाती है तो दक्षिण से आये हुए सोलंकी/चालुक्य जैसे वंश भी गुर्जरा पर फ़तेह पाने के बाद गुर्जरा नरेश या गुर्जरेश्वर क्यों कहलाये ?
8- गुज्जर एक विदेशी जाती है जो हूणों के साथ भारत आई जिसका मुख्य काम गोपालन और दूध मीट की सेना को सप्लाई था तो आज भी गुजरात में गुर्जरा ब्राह्मण गुर्जरा वैश्य गुर्जरा मिस्त्री गुर्जरा धोभी गुर्जरा नाई जैसी जातियाँ कैसे मिलती है ??
9- प्रतिहार/परिहार राजा हरिश्चंद्र को मंडोर के शीलालेखों में द्विज लिखा है ,। यह मिहिर भोज के भी पूर्वज थे। रिग वेद और मनुस्मृति के अनुसार द्विज केवल आर्य क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियाँ ही हो सकती थीं। अगर हरिशन्द्र आर्य क्षत्रिय थे तो उनके वंशज विदेशी शूद्र गुज्जर कैसे ??
10- प्रतिहारों/परिहारों की राजोरगढ़ के शिलालेखों में प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार लिखा है ये शिलालेख मण्डोर और गललका के शिलालेख से बाद के है यानी प्रतिहारों के गुर्जरा राज्य पर अधिपत्य के बाद स्थापित किये गए। सभी इतिहासकार इन्हें स्थान सूचक मानतें हैं। तो कुछ विदेशी इतिहासकार ये लिखते है के 12वि पंक्ति में गूजरों का पास के खेतों में खेती करने का जिक्र किया गया है तो इस वजह से कहा जा सकता है प्रतिहार गुज्जर थे। अब ये समझा दी भैया के राजा और क्षत्रिय की पदवी पा चुकी राजवंशी जाती क्यों खेती करेगी ?? जबकि ये तो शूद्रों का कार्य माना जाता था। यानि साफ़ है के गुर्जरा देस से राजोर आये प्रतिहार ही गुर्जरा प्रतिहार कहलाए जिनके राज्य में गुर्जर देश से आये हुए गर्जर यानी गुर्जरा के नागरिक खेती करते थे और ये प्रतिहारों से अलग थे ।।।
11- अवंती के प्रतिहार राजा, वत्सराज के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से यह पता चलता है के वत्सराज प्रतिहार ने नंदपुरी की पहली और आखिरी गुज्जर बस्ती को उखाड़ फेंका नेस्तेनाबूत कर दिया और भत्रवर्ध चौहान को जयभट्ट गुज्जर के स्थान पर जागीर दी। इस शिलालेखों से भी प्रतिहार और गुज्जरों के अलग होने के सबूत मिलते हैं तो प्रतिहार और गुज्जर एक कैसे ???
12- देवनारायण जी की कथा के अनुसार भी उनके पिता चौहान क्षत्रिय और माता गुजरी थी जिससे गूजरों की बगड़ावत वंश निकला यही उधारण राणा हर राय देव से कलस्यां गोत्र के गुज्जरों को उतपत्ति ( करनाल और मुज़्ज़फरगर ब्रिटिश गजट पढ़ें या सदियों पुराने राजपूतों के भाट रिकॉर्ड पढ़ें।) , ग्वालियर के राजा मान सिंह तंवर की गुजरी रानी मृगनयनी से तोंगर या तंवर गुज्जरों की उत्पत्ति के प्रमाण मिलतें हैं तो प्रीतिहार राजपूत वंश गुज्जरों से कैसे उतपन्न हुआ ? क्षत्रिय से शुद्र तो बना जा सकता है पर शुद्र से क्षत्रिय कैसे बना जा सकता है ??
13- जहाँ जहाँ प्रतिहार वंश का राज रहा है वहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतों की बस्ती है और यह बस्तियाँ हजारों साल पुरानी है पर यहाँ गुज्जर प्रतिहार नहीं पाये जाते।
मंडोर के इलाके में इन्दा व देवल प्रतिहार कन्नौज में कलहंस और मूल प्रतिहार , मध्य प्रदेश में प्रतिहारों को नागोद रियासत व गुजरात में प्रतिहार राजपूतों के आज भी 3 रियासत व् 200 से अधिक गाँव। न कन्नौज में गुज्जर है ना नागोद में ना गुजरात में। और सारे रजवाड़े भी क्षत्रिय व राजपूत प्रतिहार माने जाते है जबकि गुज्जरों में तो प्रतिहार गोत्र व खाप ही नहीं है तो प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
14- मिहिर भोज नागभट्ट हरिश्चंद्र प्रतिहारों के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इन तीनों को सूर्य वंशी रघु वंशी और लक्षमण के वंश में लिखा है ; गुज्जर विदेशी है तो ये सब खुद को आर्य क्षत्रिय क्यों बता के गए ??!
15- राजोरगढ़ के आलावा ग्वालियर कन्नोज मंडोर गल्लका अवंती उज्जैन के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में प्रतिहारों के लिये किसी भी पंक्ति व लेख में गुर्जर गू जर गू गुर्जरा या कोई भी मिलता जुलता शब्द या उपाधि नहीं मिलती है साफ है सिर्फ राजोरगढ़ में गुर्जरा देस से आई हुई खाप को गुर्जरा नरेश को उपाधि मिली !! जब बाकि देश के प्रतिहार गुज्जर नहीं तो राजोरगढ़ के प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
गू + जर == गूजर

Pratihar kaleen Bavdi / पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी

" पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी "
मेड़ता सिटी
सोगावास ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम पांडूका में माताजी मंदिर के पीछे स्थित नाड़ी में एक बावड़ी के अवशेष मिले हैं। यह बावड़ी सातवीं शताब्दी में निर्मित हुई थी। यह प्रतिहार कालीन है। वहां मिले एक शिलालेख से इसकी पुष्टि हुई है। मंदिर समिति इन दिनों नाडी की मिट्टी खुदवा रही है।
जेसीबी से खुदाई के दौरान अचानक भगवान गणेश की कुछ मूर्तियां, एक मंदिर का शिखर गुफानुमा सुरंग में कुछ सीढ़ियां नजर आई। इस आधार पर यहां बावड़ी मिलने का दावा किया जा रहा है। मंदिर पुजारी महावीर वैष्णव तथा कांतीदास वैष्णव आदि ने भी खुदाई में बावड़ी निकलने की पुष्टि की है।
सूचना मिलने पर राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के इतिहासकार नरेन्द्र सिंह शेखावत मौके पर पहुंचे और पुजारियों से इस बाबत जानकारी ली। शेखावत ने भास्कर न्यूज को बताया कि वहां एक धातु पात्र, नाग-नागिन की मूर्ति एवं मंदिर के अवशेष मिले हैं।
बावड़ी की सीढिय़ां स्पष्ट दिखाई देने लगी है। उन्होंने बताया कि एकाध दिन में और अधिक खुदाई होने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। शेखावत ने इस आशय की जानकारी कलेक्टर मेड़ता उपखण्ड अधिकारी राकेश कुमार गुप्ता को भी दी है। गुप्ता ने बताया कि प्राचीन बावड़ी के अवशेष मिलने की जानकारी मिली है। शनिवार को मौका देखा जाएगा।
पांडूका के माताजी मंदिर में मिले प्राचीन बावड़ी के अवशेष, यहां खुदाई जारी है।
मेड़ता में शासन की पुष्टि
प्राचीन बावड़ी पर लगे शिलालेखों से 7वीं शताब्दी में प्रतिहारों के शासन होने की तथा 13वीं शताब्दी में अल्लाउद्दीन खिलजी के प्रतिनिधि ताजूद्दीन अली के मेड़ता में शासन करने पुष्टि हो रही है।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।

History of Parihar king Vatsraj

===== सम्राट_ वत्सराज_प्रतिहार =====

सम्राट वत्सराज (775 से 810 ईस्वीं तक) प्रतिहार\परिहार राजपूत राजवंश का संस्थापक एवं वह देवराज एवं भूमिका देवी का प्रबल प्रतापी पुत्र थे । उसने शास्त्र सूत्र ग्रहण करते ही अपने पूर्वज सम्राट नागभट्ट की भांति राज्य की चारों दिशाओं में वृद्धि करने का निश्चय किया ।
उस समय उज्जैन में श्रीहर्ष का ममेरा भाई भण्डि शासन कर रहा था, वह बार बार जालौर राज्य को आधीनता में लेने का पैगाम भेज रहा था। देवराज प्रतिहार उससे डर रहा था। वत्सराज ने शासन ग्रहण करते ही उज्जैन पर आक्रमण कर दिया, राजा भण्डि को कैद कर लिया और उसके संपूर्ण परिवार को राज्य से बाहर कर दिया। वत्सराज ने ही प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी उज्जैन को बनाया।
ख्यानादि भण्डिकुलां मदोत्कट काटि प्रकार लुलंघतो।
यः साम्राज्य मरधाज्य कारमुक सखां सख्य हहादग्रहीत।।
मण्डौर राज्य के कमजोर हो जाने के बाद भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थीं।
प्रतिहार साम्राज्य - उज्जैन, राजा वत्सराज
पाल साम्राज्य - गौड़, राजा धर्मपाल
राष्ट्रकूट साम्राज्य - दक्षिण भारत राजा धु्रव
वत्सराज ने सम्मुख साम्राज्य के लिए पाल और राष्ट्रकूट दोनों ही समान खतरे थे। दोनों की निगाहें उज्जैन पर लगी थी । वत्सराज भी अवसर व साधन की प्रतिक्षा कर रहा था। भण्डि पर विजय प्राप्त होने से ववत्सराज को पर्याप्त धन युद्ध सामग्री और सैन्य बल पप्राप्त हो गया। इससे संपन्न होकर प्रतिहार वंश के प्रमुख शत्रु धर्मपाल पर वत्सराज ने ही आक्रमण कर दिया।
गंगा यमुना के दोआब मे लडा गया युद्ध अति भयानक था, अंततः धर्मपाल पीछे हटने लगा, वत्सराज ने उसे बंगाल की खाडी तक खदेडा, यहां पर पुनः एक निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में धर्मपाल ने ही संधि प्रस्ताव भेजा और उज्जैन साम्राज्य की आधीनता स्वीकार कर ली। गौड राज्य की विजय से सम्राट वत्सराज प्रतिहार का हौसला इतना बुलंद हुआ कि धर्मपाल ने और ध्रुव(राष्ट्रकूट) ने एक - एक राजछत्र और राज्यलक्ष्मी उसे भेंट कर दिया।
"हैसा स्वीकृत गौड़ राज्य कमलां मनतं प्रवेश्या विरात"
सन् 780 से 781 की महान विजय के समानांतर सन् 798 अर्थात 18 वर्ष तक उज्जैन साम्राज्य का अकंटक यह काल न केवल राजस्थान वरन संपूर्ण उत्तरी भारत का वैभव काल था। प्रशासन की स्वच्छता न्याय की आस्था और कृषि व्यापार की संपन्नता ने उज्जैन को भारत का मुकुट और वत्सराज प्रतिहार को राजाधिराज का पद दिया।।
वत्सराज सम्राट की उपाधी धारण करने वाला प्रतिहार राजपूत वंश का पहला शासक था। इसे प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
नागभट्ट प्रथम के दो भतीजे 'कक्कुक' एवं 'देवराज' के शासन के बाद 'देवराज' का पुत्र वत्सराज (775 - 810ई.) गद्दी पर बैठा।
वत्सराज के समय में ही कन्नौज के स्वामित्व के लिए त्रिदलीय संघर्ष आरम्भ हुआ था।
उसने राजस्थान के मध्य भाग एवं उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीत कर अपने राज्य में मिलाया। उसने पाल वंश के शासक धर्मपाल को भी पराजित किया।।
जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया।
प्रतिहार शासक वत्सराज (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि प्रतिहारकालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं ये मंदिर महामारू अर्थात प्रतिहार शैली में निर्मित है।।
उत्तर भारत में वर्धनवंश के पतन के बाद उत्तर भारत पर एकक्षत्र शासक प्रतिहार थे।
नागभट्ट नाम के एक नवयुवक ने इस नये साम्राज्य की नींव रखी। संभव है कि ये भडौच के प्रतिहार शासको का ही राजकुंवर था, जयभट्ट का पुत्र । पूरे उत्तर भारत में छोटे छोटे राज्य थे जो किसी भी बाह्य आक्रमण को विफल करने में पंगु बने हुए थे।
भडौच के प्रतिहार, वल्लभी के मैत्रक, वातापी के चालुक्य, भीनमाल के चपराणे,चित्तौड के मौरी,अजमेर के चौहान, भटनेर के भाटी, दिल्ली के तोमर,जालौर के प्रतिहार, इन सबमें केवल बादामी के चालुक्य साम्राज्य के स्वामी थे। वह काल विश्व इतिहास में उथल पुथल का था, संस्कृति व सभ्यताओ पर अतिक्रमण का था। अरब से उठने वाली इस्लामिक लपटो ने बहुत सी संस्कृतियो व सभ्यताओ को निगल कर उन स्थानो को इस्लामिक रंग में रंग दिया था।
यह सब ज्यादातर तलवार व भय के बल पर हो रहा था। जो काम इसाइयो ने सदियो पहले यूरोप में किया था वहीं काम एशिया में अरब के खलीफा कर रहे थे। अरब ने ईरान की विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का खात्मा करके नया ईरान गढ दिया था, वहाँ के कुछेक पारसियो ने पलायन करके भारत में शरणागत होकर अपनी बेहद प्राचीन संस्कृति को लुप्त होने से बचा लिया। इराक की महान सभ्यता अब इस्लामिक संस्कृति का केन्द्र बन गयी थी।
मिस्त्र की सभ्यता अब बदल गयी थी, तुर्की कबीले इस्लाम के नये सिपाहसलार थे, कुवैत,लीबिया पूरा का पूरा मध्य एशिया इस्लामिक संस्कृति में रंगता जा रहा था व अरब के खलीफा एक नये साम्राज्य के मालिक बन गये थे जो जिधर को रूख करता वहाँ की प्राचीन सभ्यता व विरासत को नष्ट करके नया रंगरूप देते। बर्बरता, नरसंहार,
बलात्कार, मारकाट,हाहाकार ये सब ही दिखाई देता था।।
एशिया महाद्वीप में जो भी इस्लाम स्वीकारता वहीं एक नया युद्ध छेड देता किसी अन्य देश के खिलाफ जैसे कि तुर्की, मंगोल व अफगानिस्तान उदाहरण हैं। खलीफाओ ने अरबी साम्राज्य को बेहद बडा व मजबूक बनाने के बाद आखिरकार भारत की ओर रूख किया। अरबी साम्राज्य बहुत ही बडा व संसाधनो से परिपूर्ण हो गया था। कई देश इसके अन्दर थे।।
अरबी सैनिको की वेशभूषा अस्त्र शस्त्रो से लैस थी वे हर प्रकार के हथियारो से शत्रु पर आक्रमण करते थे। लाखो की संख्या में सैनिक, बहुत से सैनिक दल, हजारो घुडसवार सब तरह की सैन्य शक्तियाँ अरबो के पास थी। यूरोप भी घुटने टेक रहा था तुर्की सैन्यदल के सामनेे। सब का लक्ष्य एक ही था। भारत सदा से ही एक उत्सुकता का केन्द्र व पहेली की तरह रहा है जिसे हर कोई जानना समझना चाहता है।
अरबी यौद्धा किसी भी प्रकार से भारत को जीतना चाहते थे व बुतपरस्ती को खत्म करके इस्लामिक देश बनाना चाहते थे। भारत पर आक्रमण केवल पश्चिमोत्तर भूमि से किया जा सकता है जहाँ राजस्थान व गुजरात व दूर चलकर पंजाब है। गुजरात व राजस्थान को तब गुर्जरात्रा प्रदेष कहा जाता था जिसकी रक्षा का दायित्व प्रतिहार राजपूत वंश पर था।
अरबो की विशाल आँधी के सामने कुछ हजार प्रतिहार राजपूत अपने रणनृत्य का प्रदर्शन करते हुए भिडे जिसे इतिहास राजस्थान के युद्ध जो कि प्रतिहार व अरबो के बीच हुए के नाम से जानता है। ये एक दो युद्ध नहीं बल्कि युद्धो की पूरी लम्बी श्रंखला थी जो सैकडो वर्षो तक प्रतिहार व अरब आक्रान्ताओ के बीच चली। जिसमें प्रतिहार राजपूतों ने अभूतपूर्व साहस व पराक्रम दिखाते हुए अरबो को बाहर खदेडा।।
भारत की हजारो साल की सभ्यता व संस्कृति को अरबो द्वारा होने वाली हानि प्रतिहार राजपूतों ने बचाया व लगभग तीन सौ सालो तक प्रतिहार राजपूत भारत के रक्षक व प्रहरी बने रहे । प्रतिहार यानी द्वारपाल है प्रतिहार राजपूतों के शिलालेखों व ताम्रपत्रों के अनुसार ये भगवान राम के भाई लक्ष्मण जी के वंशज है इन आरम्भिक युद्धो का नेतृत्व सम्राट नागभट्ट प्रतिहार प्रथम ने किया।।
नागभट्ट प्रतिहार के नेतृत्व में चित्तौड के मोरी बादामी के चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य, चौहान, सबने अरबो को बुरी तरह हर बार पराजित किया। सम्राट नागभट्ट ने अरबी आक्रमण से होने वाली उथल पुथल व अस्त व्यस्तता का अवसर उठाते हुए बहुत से राज्यो को अपने अधीन करके अपने साम्राज्य की स्थापना की। सम्राट नागभट्ट ने उज्जैन को नयी राजधानी बनाया।
नागभट्ट ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के लिये जो किया वह अतुलनीय है। इसीलिये इन्हें राष्ट्रनायक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। राष्ट्र रक्षक भारत के प्रहरी यह कथन उन्हीं के कारण चरितार्थ हुआ।
इसी समय प्रतिहार राजपूतों ने एक नये युद्धनृत्य की रचना की जिसे रणनृत्य कहा जाता है। प्रतिहार राजपूतों के संख्या बल में कम होने के कारण व शत्रुओ की विशाल सेना से भिडने से पूर्व यह नृत्य किया जाता था जिससे शत्रु को भ्रम होता था कि राजपूत सेना बहुत अधिक है।
रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने की वजह से भारत हमेशा प्रतिहार वंश के क्षत्रिय राजपूतों का रिणी रहेगा। अरबों को सफलता पूर्वक परास्त करने के कारण ही प्रतिहारों को "भारत के प्रहरी" भी कहा जाता है। बाद में प्रतिहार वंश में कई बेहद प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए जैसे कि वत्सराज प्रतिहार, नागभट्ट द्वितीय, आदिवराह सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार,महेन्द्रपाल प्रतिहार, महिपाल प्रतिहार प्रथम, वीरराजदेव प्रतिहार(नागौद राज्य के संस्थापक, यहां के प्रतिहार/परिहार राजपूत सम्राट मिहिर भोज के वंशज है आदि।
सम्राट नागभट्ट और पूरे प्रतिहार वंश के राजपूतों का नाम सदा भारतीय संस्कृति संरक्षण के लिये याद किया जाता रहा रहेगा। वे भारतीय इतिहास के महान यौद्धा थे।
नोट :- आज कल मेरे द्वारा बनाई गई प्रतिहार वंश की पोस्ट गुर्जर समुदाय के लोग चुरा कर अपने फेसबुक पेजो पर प्रतिहार वंश के साथ गुर्जर शब्द जोडकर समाज को तोड़ने का काम कर रहे है। सभी बंधुओं से अनुरोध है कि इस पर पुरजोर विरोध किया जाय नीचे दो लिंक दे रहा हूं आप देख सकते है कि कैसे ये लोग नीचता पर उतर आये है। --
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जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।