Sunday, April 10, 2016

prithviraj Chouhan or chahman Kshatriya Rajputs they are not gujjar or Gurjar

~~कृपया सभी लोग इस को जरूर पढ़े~~


जैसा की सभी को पता है की विदेशी गूँजरो के द्वारा क्षत्रिय राजपूतों के इतिहास को अपना बनाने का अभियान चलाया जा रहा हैँ। ये लोग प्रतिहार/परिहार, तंवर, सोलंकी, चौहान जैसे सभी राजपूत वंशो को गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। यहाँ तक की ये अब महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान को भी गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैँ। इसी कड़ी में पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित करने के लिए एक नया शिगूफा इन्होंने छोड़ा हैँ। इसे यहाँ पर पढ़े-
https://m.facebook.com/story.php…
गूजरो में चौहान लगाने वाले उत्तर प्रदेश के शामली जिले में और हरयाणा के करनाल में मिलते है। ये लोग राजपूत राजा राणा हर राय चौहान जी की गूजरी रखैल की सन्तान हैँ जिसके बारे में खुद इनके बुजुर्ग बताते थे। इन्हें कलसलान गूजर भी कहा जाता हैँ। ये पहले चौहान नही लगाते थे लेकिन अब लगाने लगे हैँ। इनके बुजुर्ग खुद अंग्रेज़ो को ये बता के गए थे की ये राजपूतों की नाजायज़ औलाद है और करनाल और मुजफ्फरनगर district gazetteers में ये साफ़ साफ़ लिखा है, और भी कई किताबो में इस पर लिखा हुआ है।
इन मुट्ठीभर चौहान गूजरो के दम पर ही गूजर चौहान वंश को गूजरो का वंश और पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित करने की कोशिश कर रहे हैँ। इन भैंस चोरों ने जो नई theory गढ़ी है उसके अनुसार राणा हर राय चौहान पृथ्वीराज के भाई थे और उनके वंशज कैराना में आकर बसे जो आज चौहान गूजर हैँ और जो राजपूत चौहान है वो गोले है। इन गधों को इतना नहीँ मालूम कि राणा हर राय पृथ्वीराज चौहान से भी 200 साल पहले हुए थे, जो नीमराणा से उत्तरी हरयाणा आए थे और पृथ्वीराज के भाई का नाम हरिराज था जिन्होंने अजमेर में गौरी से लड़ते हुए अपने पूरे परिवार के साथ जान दे दी थी। उनका कोई वंशज नही था। पृथ्वीराज का वंश गोविन्दराज से चला जिन्होंने रणथम्भोर में राज्य स्थापित किया।
ये सब बाते बताकर किसी को नीचा दिखाने का हमें कोई शौक नहीँ हैँ लेकिन इन गूँजरो ने हमें बहस के दौरान चुनौती दी है की ये 2 साल के अंदर पृथ्वीराज चौहान को गूजर साबित कर के दिखाएंगे। इसके जवाब में हमने भी चुनौती दी है की तुम तो कभी पृथ्वीराज को गूजर साबित नहीँ कर पाओगे लेकिन अब हम इन कलसलान गूजरों के चौहान राजपूतों की रखैल की सन्तान होने की बात सबूतों के साथ हर व्यक्ति तक जरूर पंहुचा देंगे।
इसलिये इस msg को ज्यादा से ज्यादा फैला दो जिससे इन दूधियों की असलियत दुनिया को पता चले।
करनाल gazetteer का लिंक यहाँ है-http://revenueharyana.gov.in/html/mainchild/gazetteers.htm
मुजफ्फरनगर gazetteer के लिये लिंक-http://www.muzaffarnagar.nic.in/CHAPTER%20III.HTM

Pratihar\Parihar Kshatriya Rajputs are Laxmanvanshi *** प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश *** ** लक्ष्मणवंशी प्रतिहार **

                                            *** प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश ***
                                                    ** लक्ष्मणवंशी प्रतिहार **


मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको प्रतिहार क्षत्रिय वंश के राज्य व ठिकानों की जानकारी देंगे।।
प्रतिहार एक ऐसा वंश है जिसकी उत्पत्ति पर कई महान इतिहासकारों ने शोध किए जिनमे से कुछ अंग्रेज भी थे और वे अपनी सीमित मानसिक क्षमताओं तथा भारतीय समाज के ढांचे को न समझने के कारण इस वंश की उतपत्ति पर कई तरह के विरोधाभास उतपन्न कर गए। प्रतिहार एक शुद्ध क्षत्रिय वंश है जिसने गुर्जरादेश से गुज्जरों को खदेड़ने व राज करने के कारण गुर्जरा सम्राट की भी उपाधि पाई।
मनुस्मृति में प्रतिहार,परिहार, पढ़ियार तीनों शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज
विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक,
हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की
ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी
ही लिखा गया है।
लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे,
उन्ही के वंशज परिहार है। इस वंश की 126वीं पीढ़ी में राजा हरिश्चन्द्र प्रतिहार का उल्लेख मिलता है। इनकी दूसरी पत्नी भद्रा से चार पुत्र थे।जिन्होंने कुछ धनसंचय और एक सेना का संगठन कर अपने पूर्वजों का राज्य माडव्यपुर को जीत लिया और मंडोर राज्य का निर्माण किया, जिसका राजा रज्जिल बना।इसी का पौत्र नागभट्ट प्रतिहार था, जो अदम्य साहसी,महात्वाकांक्षी और असाधारण योद्धा था।
इस वंश में आगे चलकर कक्कुक राजा हुआ, जिसका राज्य पश्चिम भारत में सबल रूप से उभरकर सामने आया। पर इस वंश में प्रथम उल्लेखनीय राजा नागभट्ट प्रथम है, जिसका राज्यकाल 730 से 760 माना जाता है। उसने जालौर को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली परिहार राज्य की नींव डाली। इसी समय अरबों ने सिंध प्रांत जीत लिया और मालवा और गुर्जरात्रा राज्यों पर आक्रमण कर दिया। नागभट्ट ने इन्हे सिर्फ रोका ही नहीं, इनके हाथ से सैंनधन,सुराष्ट्र, उज्जैन, मालवा भड़ौच आदि राज्यों को मुक्त करा लिया। 750 में अरबों ने पुनः संगठित होकर भारत पर हमला किया और भारत की पश्चिमी सीमा पर त्राहि-त्राहि मचा दी। लेकिन नागभट्ट कुद्ध्र होकर गया और तीन हजार से ऊपर डाकुओं को मौत के घाट उतार दिया जिससे देश ने राहत की सांस ली।
इसके बाद इसका पौत्र वत्सराज (775 से 800) उल्लेखनीय है, जिसने परिहार साम्राज्य का विस्तार किया। उज्जैन के शासन भण्डि को पराजित कर उसे परिहार साम्राज्य की राजधानी बनाया।उस समय भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थी। परिहार साम्राज्य-उज्जैन राजा वत्सराज, 2 पाल साम्राज्य-गौड़ बंगाल राजा धर्मपाल, 3
राष्ट्रकूट साम्राज्य-दक्षिण भारत राजा
धु्रव । अंततः वत्सराज ने पाल धर्मपाल पर आक्रमण कर दिया और भयानक युद्ध में उसे पराजित कर अपनी अधीनता स्वीकार करने को विवश किया। लेकिन ई. 800 में धु्रव और धर्मपाल की संयुक्त सेना ने वत्सराज को पराजित कर दिया और उज्जैन एवं उसकी उपराजधानी कन्नौज पर पालों का अधिकार हो गया।
लेकिन उसके पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने उज्जैन को फिर बसाया। उसने कन्नौज पर आक्रमण उसे पालों से छीन लिया और कन्नौज को अपनी प्रमुख राजधानी बनाया। उसने 820 से 825-826 तक दस भयावाह युद्ध किए और संपूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इसने यवनों, तुर्कों को भारत में पैर नहीं जमाने दिया। नागभट्ट का समय उत्तम
शासन के लिए प्रसिद्ध है। इसने 120 जलाशयों का निर्माण कराया-लंबी सड़के बनवाई। अजमेर का सरोवर उसी की कृति है, जो आज पुष्कर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां तक कि पूर्व काल में राजपूत योद्धा पुष्पक सरोवर पर वीर पूजा के रूप में नाहड़राव नागभट्ट की पूजा कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते थे।
उसकी उपाधि ‘‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर थी। नागभट्ट के पुत्र रामभद्र ने साम्राज्य सुरक्षित रखा। इनके पश्चात् इनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध मिहिर भोज साम्राट बना, जिसका शासनकाल 836 से 885 माना जाता है। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से
चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी।
अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
इतने विशाल और विस्तृत साम्राज्य का प्रबंध
अकेले सुदूर कन्नौज से कठिन हो रहा था। अस्तु भोज ने साम्राज्य को चार भागो में बांटकर चार उप राजधानियां बनाई। कन्नौज- मुख्य राजधानी, उज्जैन और मंडोर को उप राजधानियां तथा ग्वालियर को सह
राजधानी बनाया। प्रतिहारों का नागभट्ट
के समय से ही एक राज्यकुल संघ था, जिसमें कई राजपूत राजें शामिल थे। पर मिहिर भोज के समय बुंदेलखण्ड और कांलिजर मण्डल पर चंदलों ने अधिकार जमा रखा था। भोज का प्रस्ताव था कि चंदेल भी राज्य संघ के सदस्य बने, जिससे सम्पूर्ण उत्तरी पश्चिमी भारत एक विशाल शिला के रूप में खड़ा हो जाए और यवन, तुर्क, हूण आदि शत्रुओं को भारत प्रवेश से पूरी तरह रोका जा सके। पर चंदेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। अंततः मिहिर भोज ने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया
और इस क्षेत्र के चंदेलों को हरा दिया।
मिहिर भोज परम देश भक्त था-उसने प्रण किया था कि उसके जीते जी कोई विदेशी शत्रु भारत भूमि को अपावन न कर पायेगा। इसके लिए उसने सबसे पहले आक्रमण कर उन राजाओं को ठीक किया जो कायरतावश यवनों को अपने राज्य में शरण लेने देते थे। इस प्रकार राजपूताना से कन्नौज तक एक शक्तिशाली राज्य के निर्माण का श्रेय
मिहिर भोज को जाता है। मिहिर भोज के
शासन काल में कन्नौज साम्राज्य की सीमा
रमाशंकर त्रिपाठी की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ
कन्नौज, पेज 246 में, उत्तर पश्चिम् में सतलज नदी तक, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण पूर्व में बुंदेलखण्ड और वत्स राज्य तक, दक्षिण पश्चिम में सौराष्ट्र और राजपूतानें के अधिक भाग तक विस्तृत थी। सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि मिहिर भोज अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है।
सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिन्दोस्ता
की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-
इसमें हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों
रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। भोज का तृतीय अभियान पाल राजाओ के विरूद्ध हुआ। इस समय बंगाल में पाल वंश का शासक देवपाल था। वह वीर और यशस्वी था- उसने अचानक कालिंजर पर आक्रमण कर दिया और कालिंजर में तैनात भोज की सेना को परास्त कर किले पर कब्जा कर लिया। भोज ने खबर पाते ही देवपाल को सबक सिखाने का निश्चय किया। कन्नौज और ग्वालियर दोनों सेनाओं को इकट्ठा होने का आदेश दिया और चैत्र मास सन् 850 ई. में देवपाल पर आक्रमण कर दिया। इससे देवपाल की सेना न केवल पराजित होकर बुरी तरह भागी, बल्कि वह मारा भी गया। मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो
गये।
इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने
उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और हूण डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया। तदनन्तर टक्क देश के शंकर
वर्मा को हराकर सम्पूर्ण पश्चिमी भारत को
कन्नौज साम्राज्य का अंग बना लिया। चतुर्थ
अभियान में भोज ने परिहार राज्य के मूल राज्य मण्डोर की ओर ध्यान दिया। त्रर्वाण,बल्ल और माण्ड के राजाओं के सम्मिलित ससैन्य बल ने मण्डोर पर आक्रमण कर दिया। मण्डोर का राजा बाउक पराजित ही होने वाला था कि भोज ससैन्य सहायता के लिए पहुंच गया। उसने तीनों राजाओं को बंदी बना लिया और उनका राज्य कन्नौज में मिला लिया। इसी अभियान में उसने गुर्जरात्रा, लाट, पर्वत आदि राज्यों को भी समाप्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया।
---प्रतिहार/परिहार वंश की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत
साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन
इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार राजपूतों के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।
मण्डौर, राजस्थान
जालौर, राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान
पाली, राजस्थान
बेलासर, राजस्थान
कन्नौज, उतर प्रदेश
हमीरपुर उत्तर प्रदेश
प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश
झगरपुर, उत्तर प्रदेश
उरई, उत्तर प्रदेश
उन्नाव, उतर प्रदेश
ग्वालियर, मध्य प्रदेश 
उज्जैन, मध्य प्रदेश 
चंदेरी, मध्य प्रदेश
जिगनी, मध्य प्रदेश
अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश
उचेहरा, मध्य प्रदेश
दमोह, मध्य प्रदेश
सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश
एकलबारा, गुजरात
मियागाम, गुजरात
कर्जन, गुजरात
काठियावाड़, गुजरात
दुधरेज, गुजरात
खनेती, हिमाचल प्रदेश
कुमहारसेन, हिमाचल प्रदेश
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य
वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़,रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरयाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मडाढ के नाम से उत्तर हरयाणा में मिलती है। राजस्थान के सीकर से ही राघवो की एक शाखा सिकरवार निकली है जिसका फतेहपुर सिकरी पर राज था और जो आज उत्तर प्रदेश,बिहार और मध्यप्रदेश में विशाल संख्या में मिलते हैँ। विश्व का सबसे बड़ा गाँव उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का गहमर सिकरवार राजपूतो
का ही है। उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा,राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था अच्छी संख्या में हैँ ।। मित्रों आइए अब जानते है प्रतिहार/परिहार वंश की शाखाओं के बारे में।
भारत में परिहारों की 32 शाखा है। जो अभी तक की जानकारी मे है जिसमे इन शाखाओं की भी कई उप शाखाएँ है। जिससे आज प्रतिहार/परिहार वंश पूरे भारत वर्ष में फैल गये।
== प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==
(1) डाभी
(2) बडगुजर (राघव)
(3) मडाड और खडाड
(4) इंदा
(5) लल्लुरा / लूलावत
(6) सूरा
(7) रामेटा / रामावत
(8) बुद्धखेलिया
(9) खुखर
(10) सोधया
(11) चंद्र
(13) माहप
(14) धांधिल
(15) सिंधुका
(16) डोरणा
(17) सुवराण
(18) कलाहँस
(19) देवल
(20) खरल
(21) चौनिया
(22) झांगरा
(23) बोथा
(24) चोहिल
(25) फलू
(26) धांधिया
(27) खखढ
(28) सीधकां
(29) कमाष / जेठवा
(30) सिकरवार
(31) तखी
(32) परहार
ये सभी परिहार राजाओं अथवा परिहार ठाकुरों से निकलकर बनी है। आइए अब जानते है प्रतिहार वंश के महान योद्धा शासको के बारे में जिन्होंने अपनी मातृभूमि, प्रजा व राज्य के लिए सदैव ही न्यौछावर थे।
** प्रतिहार/परिहार वंश के महान राजा **
(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
नोट :- प्रतिहार/परिहार / पढ़ियार जो कि गुर्जरात्रा प्रदेश में राज किया उस वजह से प्रतिहार वंश को कुछ इतिहासकारों ने उनके नाम के साथ गुर्जर शब्द प्रयोग कर दिया है। जिससे कबीलेवादी गुज्जर समाज के लोग प्रतिहार राजपूतों को गुज्जर मूल का घोषित करने मे मुहिम सी छेड रखी है। आप सभी भी इसपर कडा विरोध करे।
ज्यादा जानकारी के लिए पेज लाइक करें।
https://m.facebook.com/Nagod-Riyasat-1380652895550208/
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

Exposing gujjar\gurjar गुर्जर\गुज्जर जाति समाज में इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर अन्य क्षत्रिय राजपूत वंश को गुर्जर मूल का बता रही है!

‪#‎गूजर‬ ख़ुद को ‪#‎विदेशी‬ से ‪#‎क्षत्रिय‬ स्वघोषित करने में कर रहे है लाखों खर्च.....










मित्रों आज कल गूजर- शोसल मीडिया पर हमारे पूर्वजों को गुर्जर घोषित कर रहे है।
इन लोगो ने मेरे फेसबुक पेज, पर बनाई गई कई प्रतिहार/परिहार वंश की पोस्ट को कापी कर और प्रतिहार/परिहार की जगह गुर्जर जोड दिया है आप सभी इनकी कारस्तानी देख सकते है और गलत रेफरेंस भी दे दिया है। अरे गूजरों मानलो की हम ही है तुम्हारे बाप है। मैने कई रेफरेंस भी मिलाये पर कोई भी सही नही था।
नीचे यह है उस फेसबुक पेज की लिंक जिसमे गुर्जर अपने को महान बता रहे है। और सभी क्षत्रिय वंश को गुज्जर मूल का बता रहे हैं।
(1) Original post link :- यह मेरे फेसबुक पेज नागौद रियासत के वह पोस्ट की लिंक है जो मैने बनाई है। नीचे लिंक है इसी पोस्ट की जिसे गुज्जरों ने अपने पेज पर इडिट किया है।
== (1) Edit by gujjar गुज्जरो दवारा - मेरी पोस्ट के साथ छेड़छाड़ का लिंक उस पोस्ट की है जिसे गुज्जरों ने इडिट किया है
(2) Original post link - यह पोस्ट मैने बनाया था। पोस्ट का टाइटल था " जालौर किले का इतिहास" जिसे गुज्जरों ने छेडछाड कर प्रतिहार/परिहार की जगह गुर्जर जोड दिया है। नीचे इसी पोस्ट का लिंक है जो गुर्जर अपने पेज पर हमे बदनाम कर रहे है
== (2) edit by gujjars गुज्जरों द्वारा- यह दूसरी लिंक है देखिए कैसे गुज्जरों ने छेडछाड की है हमारे इतिहास के साथ
ये वो महान योद्धा और क्षत्रिय वंश के राजपूत है जिसे गूजर लोग गूजर मूल बता रहे है
नागभट्ट प्रतिहार
मिहिर भोज प्रतिहार
वत्सराज प्रतिहार
पृथ्वीराज चौहान
छत्रपति शिवाजी
बप्पा रावल
इनके अलावा चौहान, परमार, सोलंकी, बाघेला, राठौर, गुहिलौत, तंवर वंश को भी गुर्जर बता रहे है
और पूरे प्रतिहार वंश को ही गुर्जर बता रहे
कुछ पिक्चर भेज रहा हूँ जरुर देखे
---- गू जरों से सवाल ----
1- प्रतिहार सम्राटो ने कन्नौज को राजधानी बनाकर पुरे उत्तर भारत में राज किया था। इनका राज बिहार मालवा तक था। उनके वंशज आज के प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार राजपूत हैं जो कन्नौज बिहार पूर्वी यूपी राजस्थान गुजरात सब जगह मिलते हैं पर गुज्जर जाति को कन्नौज में और ईस्ट यूपी बिहार गुजरात में कोई नही जानता। ऐसा क्यों ?
2-अगर प्रतिहार/परिहार गुज्जर थे तो कन्नौज और उसके आस पास कोई गुज्जर क्यों नही है?
3-गुर्जरों में प्रतिहार नाम का कोई वंश क्यूँ नही है? जबकि क्षत्रिय राजपूतो में लाखो की संख्या में प्रतिहार/परिहार वंश है।
4-प्रतिहारो का गोत्र कौशिक था जो आज भी प्रतिहार राजपूतो का गोत्र है।
अगर गुर्जर क्षत्रिय थे तो दुसरी द्विज जातियों जैसे ब्राह्मण राजपूत वैश्य की तरह गुज्जरो का कोई ऋषि गोत्र क्यों नही है?जबकि उस समय प्रतिहारो का गोत्र कश्यप था और आज भी है।
पहले चौहानो का गोत्र वत्स था और आज भी वत्स है। गुज्जरो का क्यूँ नही है?
5-अगर गूजर मिहिरभोज नागभट्ट को अपना पुरखा मानते हैं तो किसी गुज्जर को अंग्रेजो और भंडारकर जैसो की बकचोदी से पहले ये जानकारी क्यों नही थी क्योंकि उससे पहले गुजर खुद को ब्रिटिश गजेटियरो के अनुसार राजपूतो की नाजायज औलाद मानते थे।
मिहिरभोज के 1000 साल बाद अचानक से गूजरों को ब्रह्मज्ञान हो गया कि मिहिरभोज तुम्हारे पुरखे थे????
उससे पहले क्यों नही पता था??
पुरखे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को इतिहास की मौखिक जानकारी जरूर देते हैं पर तुम्हारे पुरखे तो तुम्हे बस भैंस चोरी की कहानियां ही सुनाते थे अब तुम अचानक से प्रतिहार/परिहार बन गए???~??~
6- प्रतिहारो/परिहारों के गल्लका के शिलालेख में स्पष्ट लिखा है के प्रतिहार सम्राट नागभट्ट जिन्हें गुर्जरा प्रतिहार वंश का संस्थापक भी माना जाता है ने गुर्जरा राज्य पर हमला कर गुज्जरों को गुर्जरा देश से बाहर खदेड़ा व अपना राज्य स्थापित किया... अगर प्रतिहार गुज्जर थे तो खुद को ही अपने देश में हराकर बाहर क्यों खड़ेंगे ?? मिहिर भोज के पिता प्रतिहार क्षत्रिय और पुत्र गुज्जर कैसे ??
7- हरश्चरित्र में गुजरादेश का जिक्र बाण भट्ट ने एक राज्य एक भू भाग के रूप में किया है यही बात पंचतंत्र और कई विदेशी सैलानियों के रिकार्ड्स में भी पुख्ता होती है। इस गुर्जरा देस में गुज्जरों को खदेड़ने के बाद जिस भी वंश ने राज्य किया गुर्जरा नरपति या गुर्जर नरेश कहलाया। यदि गुज्जर विदेशी जाती है तो दक्षिण से आये हुए सोलंकी/चालुक्य जैसे वंश भी गुर्जरा पर फ़तेह पाने के बाद गुर्जरा नरेश या गुर्जरेश्वर क्यों कहलाये ?
8- गुज्जर एक विदेशी जाती है जो हूणों के साथ भारत आई जिसका मुख्य काम गोपालन और दूध मीट की सेना को सप्लाई था तो आज भी गुजरात में गुर्जरा ब्राह्मण गुर्जरा वैश्य गुर्जरा मिस्त्री गुर्जरा धोभी गुर्जरा नाई जैसी जातियाँ कैसे मिलती है ??
9- प्रतिहार/परिहार राजा हरिश्चंद्र को मंडोर के शीलालेखों में द्विज लिखा है ,। यह मिहिर भोज के भी पूर्वज थे। रिग वेद और मनुस्मृति के अनुसार द्विज केवल आर्य क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियाँ ही हो सकती थीं। अगर हरिशन्द्र आर्य क्षत्रिय थे तो उनके वंशज विदेशी शूद्र गुज्जर कैसे ??
10- प्रतिहारों/परिहारों की राजोरगढ़ के शिलालेखों में प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार लिखा है ये शिलालेख मण्डोर और गललका के शिलालेख से बाद के है यानी प्रतिहारों के गुर्जरा राज्य पर अधिपत्य के बाद स्थापित किये गए। सभी इतिहासकार इन्हें स्थान सूचक मानतें हैं। तो कुछ विदेशी इतिहासकार ये लिखते है के 12वि पंक्ति में गूजरों का पास के खेतों में खेती करने का जिक्र किया गया है तो इस वजह से कहा जा सकता है प्रतिहार गुज्जर थे। अब ये समझा दी भैया के राजा और क्षत्रिय की पदवी पा चुकी राजवंशी जाती क्यों खेती करेगी ?? जबकि ये तो शूद्रों का कार्य माना जाता था। यानि साफ़ है के गुर्जरा देस से राजोर आये प्रतिहार ही गुर्जरा प्रतिहार कहलाए जिनके राज्य में गुर्जर देश से आये हुए गर्जर यानी गुर्जरा के नागरिक खेती करते थे और ये प्रतिहारों से अलग थे ।।।
11- अवंती के प्रतिहार राजा, वत्सराज के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से यह पता चलता है के वत्सराज प्रतिहार ने नंदपुरी की पहली और आखिरी गुज्जर बस्ती को उखाड़ फेंका नेस्तेनाबूत कर दिया और भत्रवर्ध चौहान को जयभट्ट गुज्जर के स्थान पर जागीर दी। इस शिलालेखों से भी प्रतिहार और गुज्जरों के अलग होने के सबूत मिलते हैं तो प्रतिहार और गुज्जर एक कैसे ???
12- देवनारायण जी की कथा के अनुसार भी उनके पिता चौहान क्षत्रिय और माता गुजरी थी जिससे गूजरों की बगड़ावत वंश निकला यही उधारण राणा हर राय देव से कलस्यां गोत्र के गुज्जरों को उतपत्ति ( करनाल और मुज़्ज़फरगर ब्रिटिश गजट पढ़ें या सदियों पुराने राजपूतों के भाट रिकॉर्ड पढ़ें।) , ग्वालियर के राजा मान सिंह तंवर की गुजरी रानी मृगनयनी से तोंगर या तंवर गुज्जरों की उत्पत्ति के प्रमाण मिलतें हैं तो प्रीतिहार राजपूत वंश गुज्जरों से कैसे उतपन्न हुआ ? क्षत्रिय से शुद्र तो बना जा सकता है पर शुद्र से क्षत्रिय कैसे बना जा सकता है ??
13- जहाँ जहाँ प्रतिहार वंश का राज रहा है वहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतों की बस्ती है और यह बस्तियाँ हजारों साल पुरानी है पर यहाँ गुज्जर प्रतिहार नहीं पाये जाते।
मंडोर के इलाके में इन्दा व देवल प्रतिहार कन्नौज में कलहंस और मूल प्रतिहार , मध्य प्रदेश में प्रतिहारों को नागोद रियासत व गुजरात में प्रतिहार राजपूतों के आज भी 3 रियासत व् 200 से अधिक गाँव। न कन्नौज में गुज्जर है ना नागोद में ना गुजरात में। और सारे रजवाड़े भी क्षत्रिय व राजपूत प्रतिहार माने जाते है जबकि गुज्जरों में तो प्रतिहार गोत्र व खाप ही नहीं है तो प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
14- मिहिर भोज नागभट्ट हरिश्चंद्र प्रतिहारों के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इन तीनों को सूर्य वंशी रघु वंशी और लक्षमण के वंश में लिखा है ; गुज्जर विदेशी है तो ये सब खुद को आर्य क्षत्रिय क्यों बता के गए ??!
15- राजोरगढ़ के आलावा ग्वालियर कन्नोज मंडोर गल्लका अवंती उज्जैन के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में प्रतिहारों के लिये किसी भी पंक्ति व लेख में गुर्जर गू जर गू गुर्जरा या कोई भी मिलता जुलता शब्द या उपाधि नहीं मिलती है साफ है सिर्फ राजोरगढ़ में गुर्जरा देस से आई हुई खाप को गुर्जरा नरेश को उपाधि मिली !! जब बाकि देश के प्रतिहार गुज्जर नहीं तो राजोरगढ़ के प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
गू + जर == गूजर

Pratihar kaleen Bavdi / पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी

" पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी "
मेड़ता सिटी
सोगावास ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम पांडूका में माताजी मंदिर के पीछे स्थित नाड़ी में एक बावड़ी के अवशेष मिले हैं। यह बावड़ी सातवीं शताब्दी में निर्मित हुई थी। यह प्रतिहार कालीन है। वहां मिले एक शिलालेख से इसकी पुष्टि हुई है। मंदिर समिति इन दिनों नाडी की मिट्टी खुदवा रही है।
जेसीबी से खुदाई के दौरान अचानक भगवान गणेश की कुछ मूर्तियां, एक मंदिर का शिखर गुफानुमा सुरंग में कुछ सीढ़ियां नजर आई। इस आधार पर यहां बावड़ी मिलने का दावा किया जा रहा है। मंदिर पुजारी महावीर वैष्णव तथा कांतीदास वैष्णव आदि ने भी खुदाई में बावड़ी निकलने की पुष्टि की है।
सूचना मिलने पर राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के इतिहासकार नरेन्द्र सिंह शेखावत मौके पर पहुंचे और पुजारियों से इस बाबत जानकारी ली। शेखावत ने भास्कर न्यूज को बताया कि वहां एक धातु पात्र, नाग-नागिन की मूर्ति एवं मंदिर के अवशेष मिले हैं।
बावड़ी की सीढिय़ां स्पष्ट दिखाई देने लगी है। उन्होंने बताया कि एकाध दिन में और अधिक खुदाई होने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। शेखावत ने इस आशय की जानकारी कलेक्टर मेड़ता उपखण्ड अधिकारी राकेश कुमार गुप्ता को भी दी है। गुप्ता ने बताया कि प्राचीन बावड़ी के अवशेष मिलने की जानकारी मिली है। शनिवार को मौका देखा जाएगा।
पांडूका के माताजी मंदिर में मिले प्राचीन बावड़ी के अवशेष, यहां खुदाई जारी है।
मेड़ता में शासन की पुष्टि
प्राचीन बावड़ी पर लगे शिलालेखों से 7वीं शताब्दी में प्रतिहारों के शासन होने की तथा 13वीं शताब्दी में अल्लाउद्दीन खिलजी के प्रतिनिधि ताजूद्दीन अली के मेड़ता में शासन करने पुष्टि हो रही है।
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।

History of Parihar king Vatsraj

===== सम्राट_ वत्सराज_प्रतिहार =====

सम्राट वत्सराज (775 से 810 ईस्वीं तक) प्रतिहार\परिहार राजपूत राजवंश का संस्थापक एवं वह देवराज एवं भूमिका देवी का प्रबल प्रतापी पुत्र थे । उसने शास्त्र सूत्र ग्रहण करते ही अपने पूर्वज सम्राट नागभट्ट की भांति राज्य की चारों दिशाओं में वृद्धि करने का निश्चय किया ।
उस समय उज्जैन में श्रीहर्ष का ममेरा भाई भण्डि शासन कर रहा था, वह बार बार जालौर राज्य को आधीनता में लेने का पैगाम भेज रहा था। देवराज प्रतिहार उससे डर रहा था। वत्सराज ने शासन ग्रहण करते ही उज्जैन पर आक्रमण कर दिया, राजा भण्डि को कैद कर लिया और उसके संपूर्ण परिवार को राज्य से बाहर कर दिया। वत्सराज ने ही प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी उज्जैन को बनाया।
ख्यानादि भण्डिकुलां मदोत्कट काटि प्रकार लुलंघतो।
यः साम्राज्य मरधाज्य कारमुक सखां सख्य हहादग्रहीत।।
मण्डौर राज्य के कमजोर हो जाने के बाद भारत में तीन महाशक्तियां अस्तित्व में थीं।
प्रतिहार साम्राज्य - उज्जैन, राजा वत्सराज
पाल साम्राज्य - गौड़, राजा धर्मपाल
राष्ट्रकूट साम्राज्य - दक्षिण भारत राजा धु्रव
वत्सराज ने सम्मुख साम्राज्य के लिए पाल और राष्ट्रकूट दोनों ही समान खतरे थे। दोनों की निगाहें उज्जैन पर लगी थी । वत्सराज भी अवसर व साधन की प्रतिक्षा कर रहा था। भण्डि पर विजय प्राप्त होने से ववत्सराज को पर्याप्त धन युद्ध सामग्री और सैन्य बल पप्राप्त हो गया। इससे संपन्न होकर प्रतिहार वंश के प्रमुख शत्रु धर्मपाल पर वत्सराज ने ही आक्रमण कर दिया।
गंगा यमुना के दोआब मे लडा गया युद्ध अति भयानक था, अंततः धर्मपाल पीछे हटने लगा, वत्सराज ने उसे बंगाल की खाडी तक खदेडा, यहां पर पुनः एक निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में धर्मपाल ने ही संधि प्रस्ताव भेजा और उज्जैन साम्राज्य की आधीनता स्वीकार कर ली। गौड राज्य की विजय से सम्राट वत्सराज प्रतिहार का हौसला इतना बुलंद हुआ कि धर्मपाल ने और ध्रुव(राष्ट्रकूट) ने एक - एक राजछत्र और राज्यलक्ष्मी उसे भेंट कर दिया।
"हैसा स्वीकृत गौड़ राज्य कमलां मनतं प्रवेश्या विरात"
सन् 780 से 781 की महान विजय के समानांतर सन् 798 अर्थात 18 वर्ष तक उज्जैन साम्राज्य का अकंटक यह काल न केवल राजस्थान वरन संपूर्ण उत्तरी भारत का वैभव काल था। प्रशासन की स्वच्छता न्याय की आस्था और कृषि व्यापार की संपन्नता ने उज्जैन को भारत का मुकुट और वत्सराज प्रतिहार को राजाधिराज का पद दिया।।
वत्सराज सम्राट की उपाधी धारण करने वाला प्रतिहार राजपूत वंश का पहला शासक था। इसे प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
नागभट्ट प्रथम के दो भतीजे 'कक्कुक' एवं 'देवराज' के शासन के बाद 'देवराज' का पुत्र वत्सराज (775 - 810ई.) गद्दी पर बैठा।
वत्सराज के समय में ही कन्नौज के स्वामित्व के लिए त्रिदलीय संघर्ष आरम्भ हुआ था।
उसने राजस्थान के मध्य भाग एवं उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीत कर अपने राज्य में मिलाया। उसने पाल वंश के शासक धर्मपाल को भी पराजित किया।।
जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया।
प्रतिहार शासक वत्सराज (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि प्रतिहारकालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं ये मंदिर महामारू अर्थात प्रतिहार शैली में निर्मित है।।
उत्तर भारत में वर्धनवंश के पतन के बाद उत्तर भारत पर एकक्षत्र शासक प्रतिहार थे।
नागभट्ट नाम के एक नवयुवक ने इस नये साम्राज्य की नींव रखी। संभव है कि ये भडौच के प्रतिहार शासको का ही राजकुंवर था, जयभट्ट का पुत्र । पूरे उत्तर भारत में छोटे छोटे राज्य थे जो किसी भी बाह्य आक्रमण को विफल करने में पंगु बने हुए थे।
भडौच के प्रतिहार, वल्लभी के मैत्रक, वातापी के चालुक्य, भीनमाल के चपराणे,चित्तौड के मौरी,अजमेर के चौहान, भटनेर के भाटी, दिल्ली के तोमर,जालौर के प्रतिहार, इन सबमें केवल बादामी के चालुक्य साम्राज्य के स्वामी थे। वह काल विश्व इतिहास में उथल पुथल का था, संस्कृति व सभ्यताओ पर अतिक्रमण का था। अरब से उठने वाली इस्लामिक लपटो ने बहुत सी संस्कृतियो व सभ्यताओ को निगल कर उन स्थानो को इस्लामिक रंग में रंग दिया था।
यह सब ज्यादातर तलवार व भय के बल पर हो रहा था। जो काम इसाइयो ने सदियो पहले यूरोप में किया था वहीं काम एशिया में अरब के खलीफा कर रहे थे। अरब ने ईरान की विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का खात्मा करके नया ईरान गढ दिया था, वहाँ के कुछेक पारसियो ने पलायन करके भारत में शरणागत होकर अपनी बेहद प्राचीन संस्कृति को लुप्त होने से बचा लिया। इराक की महान सभ्यता अब इस्लामिक संस्कृति का केन्द्र बन गयी थी।
मिस्त्र की सभ्यता अब बदल गयी थी, तुर्की कबीले इस्लाम के नये सिपाहसलार थे, कुवैत,लीबिया पूरा का पूरा मध्य एशिया इस्लामिक संस्कृति में रंगता जा रहा था व अरब के खलीफा एक नये साम्राज्य के मालिक बन गये थे जो जिधर को रूख करता वहाँ की प्राचीन सभ्यता व विरासत को नष्ट करके नया रंगरूप देते। बर्बरता, नरसंहार,
बलात्कार, मारकाट,हाहाकार ये सब ही दिखाई देता था।।
एशिया महाद्वीप में जो भी इस्लाम स्वीकारता वहीं एक नया युद्ध छेड देता किसी अन्य देश के खिलाफ जैसे कि तुर्की, मंगोल व अफगानिस्तान उदाहरण हैं। खलीफाओ ने अरबी साम्राज्य को बेहद बडा व मजबूक बनाने के बाद आखिरकार भारत की ओर रूख किया। अरबी साम्राज्य बहुत ही बडा व संसाधनो से परिपूर्ण हो गया था। कई देश इसके अन्दर थे।।
अरबी सैनिको की वेशभूषा अस्त्र शस्त्रो से लैस थी वे हर प्रकार के हथियारो से शत्रु पर आक्रमण करते थे। लाखो की संख्या में सैनिक, बहुत से सैनिक दल, हजारो घुडसवार सब तरह की सैन्य शक्तियाँ अरबो के पास थी। यूरोप भी घुटने टेक रहा था तुर्की सैन्यदल के सामनेे। सब का लक्ष्य एक ही था। भारत सदा से ही एक उत्सुकता का केन्द्र व पहेली की तरह रहा है जिसे हर कोई जानना समझना चाहता है।
अरबी यौद्धा किसी भी प्रकार से भारत को जीतना चाहते थे व बुतपरस्ती को खत्म करके इस्लामिक देश बनाना चाहते थे। भारत पर आक्रमण केवल पश्चिमोत्तर भूमि से किया जा सकता है जहाँ राजस्थान व गुजरात व दूर चलकर पंजाब है। गुजरात व राजस्थान को तब गुर्जरात्रा प्रदेष कहा जाता था जिसकी रक्षा का दायित्व प्रतिहार राजपूत वंश पर था।
अरबो की विशाल आँधी के सामने कुछ हजार प्रतिहार राजपूत अपने रणनृत्य का प्रदर्शन करते हुए भिडे जिसे इतिहास राजस्थान के युद्ध जो कि प्रतिहार व अरबो के बीच हुए के नाम से जानता है। ये एक दो युद्ध नहीं बल्कि युद्धो की पूरी लम्बी श्रंखला थी जो सैकडो वर्षो तक प्रतिहार व अरब आक्रान्ताओ के बीच चली। जिसमें प्रतिहार राजपूतों ने अभूतपूर्व साहस व पराक्रम दिखाते हुए अरबो को बाहर खदेडा।।
भारत की हजारो साल की सभ्यता व संस्कृति को अरबो द्वारा होने वाली हानि प्रतिहार राजपूतों ने बचाया व लगभग तीन सौ सालो तक प्रतिहार राजपूत भारत के रक्षक व प्रहरी बने रहे । प्रतिहार यानी द्वारपाल है प्रतिहार राजपूतों के शिलालेखों व ताम्रपत्रों के अनुसार ये भगवान राम के भाई लक्ष्मण जी के वंशज है इन आरम्भिक युद्धो का नेतृत्व सम्राट नागभट्ट प्रतिहार प्रथम ने किया।।
नागभट्ट प्रतिहार के नेतृत्व में चित्तौड के मोरी बादामी के चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य, चौहान, सबने अरबो को बुरी तरह हर बार पराजित किया। सम्राट नागभट्ट ने अरबी आक्रमण से होने वाली उथल पुथल व अस्त व्यस्तता का अवसर उठाते हुए बहुत से राज्यो को अपने अधीन करके अपने साम्राज्य की स्थापना की। सम्राट नागभट्ट ने उज्जैन को नयी राजधानी बनाया।
नागभट्ट ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के लिये जो किया वह अतुलनीय है। इसीलिये इन्हें राष्ट्रनायक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। राष्ट्र रक्षक भारत के प्रहरी यह कथन उन्हीं के कारण चरितार्थ हुआ।
इसी समय प्रतिहार राजपूतों ने एक नये युद्धनृत्य की रचना की जिसे रणनृत्य कहा जाता है। प्रतिहार राजपूतों के संख्या बल में कम होने के कारण व शत्रुओ की विशाल सेना से भिडने से पूर्व यह नृत्य किया जाता था जिससे शत्रु को भ्रम होता था कि राजपूत सेना बहुत अधिक है।
रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने की वजह से भारत हमेशा प्रतिहार वंश के क्षत्रिय राजपूतों का रिणी रहेगा। अरबों को सफलता पूर्वक परास्त करने के कारण ही प्रतिहारों को "भारत के प्रहरी" भी कहा जाता है। बाद में प्रतिहार वंश में कई बेहद प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए जैसे कि वत्सराज प्रतिहार, नागभट्ट द्वितीय, आदिवराह सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार,महेन्द्रपाल प्रतिहार, महिपाल प्रतिहार प्रथम, वीरराजदेव प्रतिहार(नागौद राज्य के संस्थापक, यहां के प्रतिहार/परिहार राजपूत सम्राट मिहिर भोज के वंशज है आदि।
सम्राट नागभट्ट और पूरे प्रतिहार वंश के राजपूतों का नाम सदा भारतीय संस्कृति संरक्षण के लिये याद किया जाता रहा रहेगा। वे भारतीय इतिहास के महान यौद्धा थे।
नोट :- आज कल मेरे द्वारा बनाई गई प्रतिहार वंश की पोस्ट गुर्जर समुदाय के लोग चुरा कर अपने फेसबुक पेजो पर प्रतिहार वंश के साथ गुर्जर शब्द जोडकर समाज को तोड़ने का काम कर रहे है। सभी बंधुओं से अनुरोध है कि इस पर पुरजोर विरोध किया जाय नीचे दो लिंक दे रहा हूं आप देख सकते है कि कैसे ये लोग नीचता पर उतर आये है। --
पहली लिंक https://m.facebook.com/story.php…
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

History of Samrat Rambhadra Pratihar

==== सम्राट_रामभद्र_प्रतिहार ====

मित्रों आज की यह पोस्ट लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजपूतों पर आधारित है। आज हम आपको प्रतिहार नरेश मिहिर भोज के पिता रामभद्र प्रतिहार के बारे मे जानकारी देगे।
नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु 833 ईस्वीं में होने के पश्चात उसका पुत्र रामभद्र प्रतिहार राज्य का उतराधिकारी बना। मिहिरभोज के वराह लेख से ज्ञात होता है कि उसकी माता का नाम इष्टादेवी था। कुछ - कुछ स्थानों पर रामभद्र के लिए राम अथवा रामदेव भी कहा गया है।
रामभद्र जैसा नाम वैसे ही गुणों से युक्त था। वह वीर, पराक्रमी, शत्रुओं को पराजित करने मे प्रशस्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति था। ग्वालियर प्रशस्ति उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए उल्लेख करती है कि जिस प्रकार अयोध्यापति राम ने धर्म की रक्षा की उसी प्रकार रामभद्र ने भी पापियों एवं क्रूर अत्याचारियों से धर्म की रक्षा की।
" तजजन्माराम नामा प्रवरहरिबलन्यस्त भूभृत प्रबन्धै।।
आवध्तन - वाहिनीनां प्रसभम अधिपतीन उदधृत क्रूर सत्वान।।
पाप - आचार - अन्तराय - प्रथमन रुचिर: संगत कीर्तिदारै:।।
त्राता धम्मॅस्य तैस - समुचित चरितै: पूर्ववन निव्वॆभासे।। 12 ।।
अर्थात -- " तब गुणी एवं चरित्रवान धर्मरक्षक राम भगवान राम की भांति हुआ जिसने श्रेष्ठ बंदरो की सहायता से निर्मित सेतुबंध द्वारा शक्तिशाली उदधृत और क्रूर जंतुओं से भरे हुए समुद्र को पार किया तथा राक्षस रुपी विघ्न का हनन करके अपनी पत्नी और कीर्ति को प्राप्त कर लिया तथा धर्म की रक्षा के कारण प्रकाशमय हुआ।।"
डाॅ के एम मुंशी ने भी ग्वालियर प्रशस्ति के आधार पर रामभद्र प्रतिहार को बहादुर, योग्य, पवित्रआत्मा, क्रूर लोगो का हनन करने वाला तथा धर्म की रक्षा करने वाला कहा है।
"Rambhadra Pratihar was brave and virtuous, Pure soil, opposed to worldliness and defender of faith "
दुर्भाग्य से रामभद्र प्रतिहार अधिक जीवित नही रहा केवल मात्र तीन वर्ष शासन करने के पश्चात उसकी मृत्यु हो गई।
(1) विद्रोहों का दमन - शक्तिशाली प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु के पश्चात प्रतिहार वंश के अनेक शत्रुओं ने साम्राज्य से विद्रोह कर अपने को स्वतंत्र करने का प्रयत्न किया, जिनका दमन रामभद्र ने बडी सफलता पूर्वक किया। उसके पिता नागभट्ट द्वितीय ने साम्राज्य की बडी सुदृढ़ नींव रखी थी, अतः रामभद्र को विद्रोहों को दबाने मे विशेष कठिनाई नही आई। उसके साम्राज्य के सेनापति जो कि मुख्य रूप से सामन्त राजा थे। जिन्होंने नागभट्ट द्वितीय के साम्राज्य विस्तार के समय अदभुत वीरता एवं कुशलता का परिचय दिया था, उन्होंने रामभद्र की आज्ञा से इन सभी क्रूर विद्रोह को कुचल दिया। ग्वालियर प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है __
" अनन्य - साधन - अधीन - प्रताप - अक्रांत - दि रामुख: ।।
उपायैस सम्पदां स्वामी य: सव्रीडमउपास्यत ।। 13 ।।"
अर्थात - उसने (रामभद्र ने) जो कि ऐश्वर्यवान, सम्पदा का स्वामी था तथा प्रतापी था, केवल पराक्रम से अपने शत्रुओं को आक्रांत किया। वह अनंत शक्तियों (साम दाम दण्ड भेद) से संपन्न था।"
डाॅ त्रिपाठी ने भी अपने ग्रन्थ में लिखा है कि "रामभद्र के शासन काल में कोई विशेष संकट अवश्य उत्पन्न हुआ था, जिसमें उसके सामांतो ने दुष्ट पापाचारियों का वध किया था।"
(2) बंगाल के पाल शासक से युद्ध - रामभद्र के शासन काल में दुष्ट शत्रु बंगाल के पाल शासक हो सकते है अथवा राष्ट्रकूट हो सकते है। परंतु राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम अपने आंतरिक संकटो एवं संघर्षों में उलझा हुआ था तथा अपने राज्य को बचाने में लगा हुआ होने के कारण उसके द्वारा किसी भी संकट की आशंका नही हो सकती। दूसरा शत्रु पाल नरेश देवपाल हो सकता है। देवपाल 810 ईस्वीं में पाल नरेश धर्मपाल का उतराधिकारी बना। यह संभावना हो सकती है कि उसने अपने पिता की पराजय का बदला लेने के लिए शक्ति संगठित कर नागभट्ट द्वितीय की मृत्यु के पश्चात प्रतिहार साम्राज्य पर आक्रमण किया हो। देवपाल भी एक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने पराक्रम से अपने साम्राज्य को बहुत विस्तृत कर लिया था। बादल स्तम्भलेख के अनुसार पाल नरेश देवपाल ने प्रतिहारों पर विजय प्राप्त की थी। यह समय निश्चित रूप से रामभद्र के शासन काल का ही हो सकता है। चूँकि इस स्तंभ लेख मे प्रतिहार नरेश का नाम नही मिलता। इसलिए इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है।
डॉ बी एन पुरी के अनुसार बादल अभिलेख में जिस नरेश की पराजय का उल्लेख मिलता है, वह रामभद्र प्रतिहार ही था।
डॉ रमाशंकर त्रिपाठी की बादल स्तम्भ लेख में पराजित नरेश मिहिर भोज था, रामभद्र नहीं।
डॉ आर सी मजूमदार का मत है, दूसरा प्रतिहार राजा भोज अपनी सफलताओं के बाद भी देवपाल से पराजित हुआ और अपने परिवार की ख्याति को तब तक सुरक्षित न रख सका, जब तक देवपाल जीवित रहा।
उस काल की परिस्थितियों का विश्लेषण करने पर यह सपष्ट हो जाता है कि पाल नरेश देवपाल ने प्रतिहार नरेश रामभद्र को ही पराजित कर अपने पिता धर्मपाल की पराजय का प्रतिशोध लिया था। परंतु वह अपनी विजय को अधिक समय तक संभालकर नहीं रख सका जैसा कि ग्वालियर प्रशस्ति श्लोक 12 व श्लोक 13 में सपष्ट उल्लेख है कि रामभद्र ने अपने सामंत राजाओं की सहायता से पाल नरेश को पराजित किया तथा अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखा।
कुछ इतिहासकारों ने कालंजर मंडल एवं गुर्जरात्रा प्रदेष एवं ग्वालियर प्रदेश के प्रतिहार साम्राज्य से स्वतंत्र होने का उल्लेख किया है। इसकी पुष्टि में वराह अभिलेख के महाराज नागभट्ट देव के एवं दौलतपुर अभिलेख से महाराज वत्सदेव के दान के उल्लेख का वर्णन करते हुए कहा है कि रामभद्र प्रतिहार के शासन में इन दोनों की पुष्टि नहीं मिलती। परंतु यह कोई शक्तिशाली तथ्य नहीं है। क्योंकि रामभद्र प्रतिहार को केवल तीन वर्ष का ही शासन करने को मिला जिसमें उसने विद्रोहों का दमन किया जैसा कि ग्वालियर प्रशस्ति बताती है। इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि अनय् बातों के लिए अवकाश मिला हो। ऐसा भी उल्लेख कहीं नही मिलता कि उपरोक्त क्षेत्रों में कोई विद्रोह हुए हों।
ग्वालियर में रामभद्र प्रतिहार द्वारा मनोनीत प्रशासक वैल्लभट्ट वहां शासन कर रहा था।
कालंजर मंडल के चंदेल एवं मण्डौर के प्रतिहार रामभद्र के समय भी अधीनस्थ सामन्त रहते हुए शासन कर रहे थे। अतः जब तक कोई मजबूत साक्ष्य नहीं हो तब तक ऐसा उललेख उचित नही कहा जा सकता।
वराह अभिलेख के अनुसार रामभद्र की मृत्यु विक्रम संवत 893 यानि 836 ईस्वीं में हुई।
Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india
Refrence : -
(1) ग्वालियर प्रशस्ति (श्लोक 12 एवं 13)
(2) डॉ के एम मुंशी - The glory that was gurjar desh
(3) डाॅ त्रिपाठी - History of kannauj
(4) बादल स्तंभ लेख
(5) डाॅ बी एन पुरी - History of Gurjar - Pratihar
(6) डाॅ आर सी मजूमदार - क्लासिकल ऐज
(7) वराह अभिलेख
(8) दौलतपुर अभिलेख
(9) मण्डोर से नागौद - रामलखन सिंह परिहार
(10) डाॅ रमाशंकर त्रिपाठी - History of Kannauj
जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।

Thursday, March 31, 2016

history of mandore fort

~~~ मंडौर राज्य ~~~
~~~ परिहार राजपूतों का इतिहास ~~~

प्रतिहार परिहार क्षत्रियों के मण्डौर राज्य का इतिहास मण्ड़ोर दुर्ग मंडौर जोधपुर की स्थापना से पूर्व मारवाड़ की राजधानी थी। मण्ड़ोर का नाम प्राचीन काल में मांडव्यपुर था, जो माण्डव्य ॠषि के नाम पर पड़ा था। घटियाला से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि मण्डोर दुर्ग का निर्माण ७ वीं शताब्दी के पूर्व हो चुका था। शिलालेखों के अनुसार विप्र हरिचन्द्र परिहार के पुत्रों ने मण्डौर पर अधिकार कर लिया तथा ६२३ ई० में उन्होंने इसके चारों ओर दीवार बनवाई। मण्डोर दुर्ग के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। यह दुर्ग एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित था, जिसकी ऊँचाई ३०० से ३५० फुट थी। यह दुर्ग आज खंड़हर हो चुका है। कुछ खण्डहरों के नीचे पड़ा है तथा कुछ विघटित अवस्था में है। विघटित अवस्था में विद्यमान दुर्ग को देखकर यद्यपि उसकी वास्तविक निर्माण विधि का पूरा आकलन नही किया जा सकता तथापि इस विषय में कुछ अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है। पहाड़ी पर स्थित इस दुर्ग के चारों ओर पाषाण निर्मित दीवार थी। दुर्ग में प्रवेश करने के लिए एक मुख्य मार्ग था। दुर्ग की पोल पर लकड़ी से निर्मित
विशाल दरवाजा था। दुर्ग के शासकों के निवास के लिए महल, भण्डार, सामंतो व अधिकारियों के भवन आदि बने हुए थे। जिस मार्ग द्वारा नीचे से पहाड़ी के ऊपर किले तक पहुँचा जाता था वह उबड़-खाबड़ था। किले की प्राचीर में जगह-जगह चौकोर छिद्र बने हुए थे। मण्ड़ोर को दुर्ग सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से तात्कालीन समय में काफी सुदृढ़ एवं महत्वपूर्ण समझा जाता था। इसके कारण शत्रु की सेना को पहाड़ी पर अचानक चढ़ाई करने में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। दुर्ग में प्रवेश-द्वार इस तरह से निर्मित किए गए थे कि उन्हें तोड़ना शत्रु के लिए असंभव सा था। किले में पानी की प्रयाप्त व्यवस्था होती थी जिससे
आक्रमण के समय सैनिकों एवं रक्षकों को जल की
कमी का सामना नही करना पड़े। इस दुर्ग की प्राचीर चौड़ी एवं सुदृढ़ थी। दुर्ग के पास ही एक विशाल जलाशय का निर्माण करवाया गया था। इस जलाशय की सीढियों पर नाहरदेव नाम अंकित है जो मण्ड़ोर का अंतिम परिहार राजपूत शासक था। दुर्ग की दीवारें पहाड़ी के शीर्ष भाग से ऊपर उठी हुई थीं। बीच के समुन्नत भाग पर विशाल महल बने थे जो नीचे के मैदानों पर छाये हुए थे। मण्ड़ोर दुर्ग के बुर्ज गोलाकार न होकर अधिकांशत: चौकोर थे, जैसे कि अन्य प्राचीन दुर्गों में मण्ड़ोर दुर्ग ७८३ ई० तक परिहार राजपूत शासकों के अधिकार में रहा। इसके बाद नाड़ोल के चौहान शासक रामपाल ने मण्ड़ोर दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। १२२७ ई० में गुलाम वंश के शासक इल्तुतनिश ने मण्ड़ोर पर अधिकार कर लिया। यद्यपि परिहार शासकों ने तुर्की आक्रांताओं का डट कर सामना किया पर अंतत: मण्ड़ोर तुर्कों के हाथ चला गया। लेकिन तुर्की आक्रमणकारी मण्ड़ोर को लम्बे समय तक अपने अधिकार में नही रख सके एंव दुर्ग पर पुन: प्रतिहारों का अधिकार हो गया। १२९४ ई० में फिरोज खिलजी ने परिहारों को
पराजित कर मण्ड़ोर दुर्ग अधिकृत कर लिया, परंतु
१३९५ ई० में परिहारों की इंदा शाखा ने दुर्ग पर
पुन: अधिकार कर लिया। इन्दों ने इस दुर्ग को चूंडा राठौड़ को सौंप दिया जो एक महत्वाकांक्षी शासक था। उसने आस-पास के कई प्रदेशों को अपने अधिकार में कर लिया। १३९६ ई० में गुजरात के फौजदार जफर खाँ ने मण्ड़ोर पर आक्रमण किया। एक वर्ष के निरंतर घेरे के उपरांत भी जफर खाँ को मंडोर पर अधिकार करने में सफलता नही मिली और उसे विवश होकर घेरा उठाना पड़ा। १४५३ ई० में राव जोधा ने मण्डोर दुर्ग पर आक्रमण किया। उसने मरवाड़ की राजधानी मण्डोर से स्थानान्तरित करके जोधपुर ले जाने का निर्णय लिया। राजधानी हटने के कारण मण्ड़ोर दुर्ग धीरे-धीरे वीरान होकर खंडहर में तब्दील हो गया।।

मण्डौर राजस्थान के जिला जोधपुर के अंतर्गत जिला मुख्यालय से लगभग 6 कि. मी. की दूरी पर बसा था| इस स्थान पर वर्तमान में मण्डौर नगर के अवशेस मात्र है । यह स्थान पौराणिक काल में लंकापति रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का पीहर था , अर्थात रावण की ससुराल कहे जाने वाले
मण्डौर के भग्र किले की खुदाई में एक प्राचीन मंदिर का गर्भ , सभामंडप , परिक्रमा स्थल सहित नवी दसवी शताब्दी की दुर्लभ गजलक्ष्मी की प्रतिमा मिली है|

इतिहासकार इसे प्रतिहारों का राज्य मानते है क्योंकि यहाँ सर्वाधिक प्रतिहार शासक ही रहे है । मण्डौर में सर्वप्रथम प्रतिहार राजा हरिचंद्र हुए। क्षत्राणी रानी भद्रा प्रतिहार से उत्पन्न हुए पुत्र अपनी महत्वाकांक्षा को रोक न सके चारो क्षत्रिय कुमारो ने मण्डौर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊँचा किया इस प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ " मेढ़ता " से हुआ । मण्डौर मेढ़ता राज्य के नाम से स्थापित घटियाला अभिलेख से प्राप्त होता है की प्रथम परिहार राज्य का संस्थापक रज्जिल परिहार था। उसने मेढ़ता और मरूडाम में नवीन दुर्गो की रचना करवाई और अपने तीनो भाइयों की सहायता से सैन्य संगठन किया - समीपवर्ती 6 राज्यों को को विजित कर लिया । शासन व्यवस्था सुदृण हो जाने पर अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र नरभट परिहार का राज्य तिलक बड़े समारोह के साथ करवाया |

कर्नल टाड ने अपने राजस्थान के इतिहास में उल्लेख किया है की प्रतिहारों का प्रादुर्भाव आदि में मण्डौर से हुआ है । किन्तु बात तब की है जब मण्डौर का राजा मुकुल परिहार था । उसकी सिंसोंध में बाड़ के राजा से प्रतिदंद्विता थी, उस समय शक्ति परीक्षण का युग था ।" जिसकी लाठी उसी की भैंस " राहुप ने मण्डौर पे चढ़ाई कर मुकुल परिहार को बंदी बना सिंसोंध ले आया था । मुकुल से राणा की उपाधि तथा एक नगर जोहबाढ़ लेकर उसे मुक्त कर दिया । स्वयं राहुप राणा की उपाधि धारण करने लगा । राहुप सिंसोंध के जागीरदार माहप का अनुज था |

राणा की उपाधि की पुष्टि गौरीशंकर हरिचंद्र ओझा लिखित राजपूत का इतिहास के इस अंश से भी होती है की बाउक प्रतिहार को राणा की उपाधि से विभूषित किया गया था । मण्डौर के प्रतिहारों से ली हुई राणा की पदवी के कारण ही कालांतर में चितौड़ के सिंसोंदिया शासक महाराणा कहलाने लगे । अंतिम मण्डौर शासक हम्मीर जिसे चारडो ने राणा लिखा है , राठौर चूड़ा ने 1394 ई. में दुर्ग छीना था । अतः उपर्युक्त पंक्तियों में हम स्पस्ट कर चुके है की प्रतिहार सत्ता का प्रादुर्भाव मण्डौर से हुआ । मण्डौर के प्रतिहारों की ज्येष्ठ शाखा गुजरत्रा क्षेत्र का जालौर था । भिनमाल में राजधानी स्थापित कर शासन करने की पुष्टि इतिहासकारों के मतानुसार होती है

डा. के. सी. जैन ने अपनी पुस्तक राजपूतों के इतिहास में मत सहमत किया है की इस शाखा की स्थापना राजा हरिचंद्र के द्वारा की गयी है । इसने अपना राज्य राजपूताना में जोधपुर के आस पास 550 ई. के लगभग स्थापित किया था इससे लगभग 850 ई. के राजाओं का अल्प सक्षिप्त इतिहास प्राप्त होता है |

भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने ही प्रतिहार का कार्य किया था । इसीलिए यह वंश परिहार वंश के नाम से विख्यात हुआ । यही तथ्य कुकुक्क के घटियाला अभिलेख में भी दोहराया गया है । " उपर्युक्त दोनों अभिलेखों से प्रतिहार वंश के आद्य पुरुष हरिचंद्र को विप्र कहा गया । क्षत्रिय राजा हरिचंद्र के लिए 'विप्र' शब्द का उपयोग उल्लेखनीय है । वृह दोरण्य कोपनिषद् के अनुसार सबसे पहले क्षत्रिय हुए और उनके बाद अन्य वर्णों का जनम हुआ । इसी प्रकार ब्रजसूचिकोपनिषद् में निम्नांकित श्लोक मिलता है |

जन्मना जायते शूद्र संस्काराद्विज ऊचयते ।।
वेदपाठ वदेः विप्रः ब्रम्हा जानाति ब्राहाडाः ।।

मंडौर राज्य।।
परिहार राजपूत।।
नागौद रियासत।।